जेएनयू में लाल सलाम! छात्रसंघ चुनावों में युनाइटेड लेफ्ट का डंका,आइसा की गीता कुमारी बनीं अध्यक्ष

By: Dilip Kumar
9/11/2017 3:20:32 AM
नई दिल्ली

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्र संघ (जेएनयूएसयू) के केन्द्रीय पैनल के लिए हुए चुनाव में यूनाइटेड लेफ्ट ने बाजी मारी और सभी चारों पदों पर विजय हासिल की। वाम प्रत्याशियों ने आरएसएस सर्मिथत एबीवीपी के अधिकतर उम्मीदवारों को बड़े अंतर से हराया। हालांकि अध्यक्ष पद के लिए कड़ी टक्कर हुई जिसमें यूनाइटेड लेफ्ट की प्रत्याशी गीता कुमारी ने एबीवीपी की निधि त्रिपाठी को 464 मतों से हराया।

चुनाव अधिकारियों ने बताया कि बापसा (बिरसा अंबेडकर फुले स्टूडेंट्स एसोसिएशन) की शबाना अली को 935 मत मिले हैं। उन्होंने बताया कि चुनाव में कुल 4639 मत पड़े जिनमें से 19 मत अवैध हो गये क्योंकि मतदाताओं ने अपनी पर्ची गलत मतपत्र पर लगा दी। उपाध्यक्ष पद के लिए आइसा की सिमोन जोया खान को 1,876 वोट मिले। चुनाव में कुछ 4,620 वोट पड़े जिनमें से एबीवीपी प्रत्याशी दुर्गेश कुमार के हिस्से में महज 1,028 वोट आये।

वाम के दुग्गीराला श्रीकृष्ण ने महासचिव पद अपने नाम किया, उन्हें 2,080 वोट मिले। संयुक्त सचिव का पद भी वाम के शुभांशु सिंह के हिस्से गया जिन्हें 1,755 मत मिले। गीता कुमारी ने कहा, ‘‘इस जनादेश का श्रेय विद्यार्थियों को जाता है क्योंकि लोगों को अब भी विश्वास है कि लोकतांत्रिक स्थानों को बचाया जाना चाहिए और इस दिशा में एकमात्र संघर्ष विद्यार्थियों की ओर से किया जा रहा है।’’

गीता ने नजीब मामले के साथ-साथ जेएनयू की सीटों में कटौती, नये छात्रावासों सहित विभिन्न मामलों को उठाने का वादा किया है। केन्द्रीय पैनल की चार सीटों के लिए हुए चुनाव में कुल 1512 वोट नोटा के नाम भी रहे। चुनाव अधिकारियों ने बताया कि विभिन्न पदों पर कुल 31 काउंसल चुने गए।

लेफ्ट गठबंधन न करता तो भगवा हो जाता ‘लाल दुर्ग’

जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी छात्र संघ चुनाव में लेफ्ट ने पहले ही भांप लिया था कि यहां पर भगवा झंडा यानी अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) कहीं से भी कमजोर नहीं है. इसलिए तीन संगठनों ने मतभेद भुलाकर गठबंधन किया. वरना यहां की तस्‍वीर कुछ और होती. विद्यार्थी परिषद को छोड़कर और सभी संगठन कमजोर हुए हैं. यहां तक कि जीत के बावजूद लेफ्ट का वोट कम हुआ है.

2016 के चुनाव में एबीवीपी के बढ़े वोट प्रतिशत को देखते हुए लेफ्ट के नेताओं ने अपनी स्‍थिति का अंदाजा लगा लिया था. उन्‍हें पता था कि जेएनयू कैंपस में दक्षिणपंथी विचारों का सिर्फ एक प्रतिनिधि है. इसलिए उसे कम मानना ठीक नहीं होगा. इसलिए लेफ्ट के नेताओं ने समझदारी से काम लिया. आमतौर पर जेएनयू में लेफ्ट बनाम लेफ्ट की जंग होती रही है, लेकिन एबीवीपी और बापसा (बिरसा-अंबेडकर-फूले स्‍टूडेंट एसोसिएशन) की मौजूदगी ने उसे डराया.

इसके बाद एबीवीपी और बापसा को रोकने के लिए 2016 में आईसा (ऑल इंडिया स्‍टूडेंट्स एसोसिएशन) और एसएफआई (स्‍टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया) ने साथ चुनाव लड़ा था. लेकिन इस बार गठबंधन में डीएसएफ (डेमोक्रेटिक स्‍टूडेंट्स फेडरेशन) भी शामिल किया. वरना स्‍थितियां बदल सकती थीं.

वर्ष 2016 में लेफ्ट यूनिटी की ओर से अध्‍यक्ष पद के उम्‍मीदवार मोहित पांडे ने 1954 वोट लेकर जीत दर्ज की थी. जबकि इस बार तीन वाम संगठनों के गठबंधन की उम्‍मीदवार गीता कुमारी जीत तो गई हैं लेकिन उन्‍हें वोट सिर्फ 1506 ही मिले हैं. आईसा के महासचिव संदीप सौरव का कहना है कि वोट कम पड़ा है इसलिए लेफ्ट का वोट कम हुआ है, और कोई बात नहीं है.

एबीवीपी हुआ पहले से मजबूत

भगवा झंडे का प्रतिनिधत्‍व करने वाले संगठन एबीवीपी ने अपना वोट बरकरार रखा है. 2016 में अध्‍यक्ष पद की उम्‍मीदवार जान्‍हवी 1048 वोट लेकर तीसरे स्‍थान पर थीं. जबकि इस बार निधि त्रिपाठी 1042 वोट लेकर दूसरे नंबर पर रही हैं. यही नहीं पिछली बार एबीवीपी का सिर्फ एक काउंसलर था. जबकि इस बार 12 काउंसलर जीते हैं.

एबीवीपी के संयुक्‍त सचिव श्रीनिवास का कहना है कि ‘2016 के चुनाव में सिर्फ उपाध्‍यक्ष पद के लिए हम दूसरे नंबर पर थे, लेकिन इस बार सभी चार पदों पर दूसरे पर आ गए हैं. अगले चुनाव तक हम लोग लाल दुर्ग को भेद लेंगे. हमारा फोकस उन 2400 छात्रों को जोड़ने का होगा जिन्‍होंने वोट नहीं डाला. करीब 4600 वोट ही डाले गए हैं’.

बापसा का वोट भी लेफ्ट की तरह ही कम हुआ है. 2016 में इस संगठन से एस. राहुल 1545 वोट लेकर दूसरे स्‍थान पर थे, जबकि इस बार शबाना अली को सिर्फ 935 वोट लेकर तीसरे स्‍थान पर संतोष करना पड़ा. यह संगठन सिर्फ तीन साल पुराना है और लेफ्ट के ही वोटों में सेंध लगा रहा है.

निर्दलीय से भी पिछड़ गईं अपराजिता राजा

इस चुनाव में सबसे दिलचस्‍प पहलू निर्दलीय फारुख आलम से जुड़ा है. रसियन लैंग्‍वेज पढ़ने वाले बिहार के इस दिव्‍यांग छात्र फारुख आलम ने 419 वोट लेकर कम्‍युनिस्‍ट पार्टी ऑफ इंडिया से राज्‍यसभा सांसद डी. राजा की बेटी एआईएसएफ (ऑल इंडिया स्‍टूडेंट्स फेडरेशन) की उम्‍मीदवार अपराजिता राजा से ज्‍यादा वोट बटोर लिए. अपराजिता को सिर्फ 416 वोट मिले हैं.

आलम 7 सितंबर की प्रेसिडेंशियल डिबेट में उस वक्‍त चर्चा में आए थे जब अपने जोशीले भाषण से लेफ्ट संगठनों, एबीवीपी और बापसा सबकी पोल खोल दी थी. उनके पास न कोई डफली बजाने वाला था और न ही नाचने वाला.एनएसयूआई को नोटा से भी कम वोट दूसरी ओर, एक बार फिर साबित हो गया है कि जेएनयू में एनएसयूआई (नेशनल स्‍टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया) का कोई स्‍कोप नहीं है. इसकी वृष्‍णिका सिंह को सिर्फ 82 वोट से संतोष करना पड़ा है, जो कि नोटा के 127 वोट से भी कम है.

सैनिक की बेटी है JNUSU की नई अध्यक्ष गीता, निर्भया आंदोलन में लिया था बढ़-चढ़कर भाग

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्र संघ (जेएनयूएसयू) के केन्द्रीय पैनल के लिए हुए चुनाव में यूनाइटेड लेफ्ट ने बाजी मारी और सभी चारों पदों पर विजय हासिल की। वाम प्रत्याशियों ने आरएसएस सर्मिथत एबीवीपी के अधिकतर उम्मीदवारों को बड़े अंतर से हराया। हालांकि अध्यक्ष पद के लिए कड़ी टक्कर हुई जिसमें यूनाइटेड लेफ्ट की प्रत्याशी गीता कुमारी ने एबीवीपी की निधि त्रिपाठी को 464 मतों से हराया।

कौन है गीता कुमारी

गीता हरियाणा के पानीपत की रहने वाली हैं। उनके पिता भारतीय सेना में हैं और फिलहाल जोधपुर में तैनात हैं। गीता ने इलाहाबाद और गुवाहाटी के आर्मी स्कूल से अपनी पढ़ाई की। उन्होंने 2011 में जेएनयू में बीए कोर्स में एडमिशन लिया। इस दौरान वो दो बार स्कूल ऑफ लैंगुएज की काउंसलर रहीं। गीता जेएनयू की जेंडर सेंसेटाइजेशन कमेटी का चुनाव भी जीतीं। गीता आइसा यानी ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) की सदस्य हैं। फिलहाल गीता स्कूल ऑफ सोशल साइंस से एम.फिल कर रही हैं। मॉर्डन हिस्ट्री में सेकेंय ईयर की स्टूडेंट हैं।

निर्भया आंदोलन में दिखी थी लीडरशिप

AISA की जेएनयू यूनिट के अध्यक्ष रामा नागा ने बताया कि 2012 में निर्भया कांड के बाद जेएनयू छात्रों ने जो बड़ा आंदोलन खड़ा किया, उसमें गीता की लीडरशिप देखने को मिली थी। उन्होंने बताया कि कैंपस में आने के बाद से ही गीता महिलाओं के मुद्दों को लेकर अग्रणी रही हैं।

BJP और आरएसएस पर साधा निशाना

रामा नागा ने बताया कि बीजेपी और आरएसएस के लोग जेएनयू कैंपस में टैंक रखने की बात करते हैं। राष्ट्रवाद को लेकर दिखावा करते हैं। जेएनयू के तमाम ऐसे छात्र हैं, जिनके घरवाले सेना में हैं, मगर वो उसकी नुमाइश नहीं करते।


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