1.3 अरब की आबादी का इलाज करने के लिए केवल 10 लाख एलोपैथिक डॉक्टर

By: Dilip Kumar
7/1/2019 7:17:51 PM
नई दिल्ली

हमारे देश में 1.3 अरब लोगों की आबादी का इलाज करने के लिए केवल 10 लाख एलोपैथिक डॉक्टर हैं। इनमें से भी सिर्फ 1.1 लाख डॉक्टर ही ऐसे हैं, जो सार्वजनिक स्वास्थ्य क्षेत्र में काम करते हैं। एक अन्य रिपोर्ट से यह पता चलता है कि तमाम गतिरोध और एच1बी1 वीजा के बदलते नियमों के बावजूद अमेरिका में चिकित्सा क्षेत्र के उच्च पदों में 38 फीसदी पद भारतीयों के पास हैं। एक अमेरिकी शोध में पाया गया है कि अमेरिका में मरीजों की जान बचाने के मामले में भारतीय डॉक्टरों की संख्या ज्यादा है। बोस्टन स्थित हॉर्वर्ड मेडिकल स्कूल में हुए शोध में यह सामने आया है कि अमेरिका में काम कर रहे भारतीय डॉक्टरों द्वारा किए गए इलाज में मौत की दर कम रही है। हालांकि हमारे अपने देश में स्थिति इसके उलट है।

हमारे देश में मरीजों का इलाज करने के लिए पर्याप्त डॉक्टर नहीं हैं। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) की रिपोर्ट के अनुसार ,डॉक्टरों और मरीजों का अनुपात बिगड़ा होने की वजह से ज्यादातर अस्पतालों में एक बिस्तर पर दो मरीजों तक को रखना पड़ जाता है। भारत में न तो पर्याप्त अस्पताल हैं, न डॉक्टर, न नर्स और न ही सार्वजनिक स्वास्थ्य कर्मचारी। स्वास्थ्य देखभाल की गुणवत्ता और उपलब्धता में बड़ा अंतर है।

ऐसा नहीं है कि यह अंतर केवल राज्यों के बीच है, बल्कि शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में इसे स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। इसका फायदा उठाते हैं झोलाछाप डॉक्टर और नीम-हकीम। ये लोग खुद को डॉक्टर बताकर गरीब और कम पढ़े-लिखे लोगों को धोखा देते हैं। इनकी वजह से हर साल हजारों जानें भी जाती हैं। डॉक्टरों की कमी की वजह से लोगों के पास इलाज के लिए ऐसे फर्जी डॉक्टरों के पास जाने के अलावा अन्य कोई विकल्प भी नहीं होता है। लेकिन एक सच्चाई यह भी है कि हमारे देश में डॉक्टरों के खिलाफ हिंसा भी होती है। यही कारण है कि इस साल डॉक्टर्स डे की थीम 'डॉक्टरों के खिलाफ होने वाली हिंसा को रोकना' रखी गई है। 75 फीसदी भारतीय डॉक्टर्स कार्य के दौरान किसी न किसी तरह की हिंसा का शिकार होते हैं। जबकि अमेरिका और यूरोप में यह आंकड़ा 50 से 60 फीसदी है।

चिकित्सकों की कमी

एक अनुमान के मुताबिक देश में इस समय 460 चिकित्सा महाविद्यालय हैं। इनमें से 45 प्रतिशत सरकारी क्षेत्र में और 55 फीसदी निजी क्षेत्र में हैं। वर्ष 2019 तक देश में 725 जिले हैं, जबकि 57 फीसदी जिलों में एक भी मेडिकल कॉलेज न होने से चिकित्सा अध्ययन की कोई व्यवस्था ही नहीं है। देशभर में इस समय सबसे ज्यादा मेडिकल कॉलेज कर्नाटक में हैं, जबकि महाराष्ट्र इस मामले में दूसरे नंबर पर हैं। डॉक्टरों की तैनाती की बात करें तो महाराष्ट्र इस समय सर्वाधिक डॉक्टर तैनात हैं। डॉक्टरों की तैनाती के मामले में कर्नाटक देश में तीसरे स्थान पर है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, दुनियाभर में नकली दवाइयों का 35 फीसदी हिस्सा भारत से ही जाता है और इसका करीब 4000 करोड़ रुपये के नकली दवा बाजार पर कब्जा है। हमारे देश में बिकने वाली लगभग 20 फीसदी दवाइयां नकली होती हैं।

फरवरी में आए केंद्र सरकार के अंतरिम बजट में स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए 61,398 करोड़ रुपये के प्रावधान की घोषणा की थी। स्वास्थ्य के लिए यह राशि पिछले दो वर्षों में सबसे ज्यादा है। वहीं चुनाव पूर्व ही भारतीय जनता पार्टी ने अपने घोषणा पत्र में कहा था कि देश में 75 नए मेडिकल कॉलेज और पोस्ट ग्रेजुएट मेडिकल कॉलेज खोले जाएंगे। 1400 लोगों पर एक डॉक्टर का अनुपात लाएंगे। 2022 तक देश के हर गरीब के दरवाजे तक प्राथमिक चिकित्सा सुविधा मुहैया कराई जाएगी। आयुष्मान भारत योजना के तहत 2022 तक डेढ़ लाख हेल्थ ऐंड वेलनेस सेंटर (एचडब्ल्यूसी) खोले जाएंगे। यहां टेलिमेडिसिन और डायग्नोस्टिक लैबरेटरी की सुविधा उपलब्ध होगी।

 


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