MOVIE REVIEW: थोड़ा देवदास और थोड़ा गैंग्स ऑफ वासेपुर का मिश्रण है 'दास देव'

By: Dilip Kumar
4/28/2018 11:56:33 PM
नई दिल्ली

शरतचंद्र चट्टोपाध्याय के ‘देवदास’ ने भारतीय फिल्मकारों को अपनी ओर बहुत आकर्षित किया है। वह मूक सिनेमा से लेकर अब के अत्याधुनिक युग तक भारतीय फिल्मकारों का पसंदीदा किरदार बना हुआ है। यही वजह है कि नरेश चंद्र मिश्र, प्रथमेश चंद्र बरुआ, बिमल राय से लेकर संजय लीला भंसाली, अनुराग कयश्प और अब सुधीर मिश्रा जैसे फिल्मकारों ने उसे अपने दृष्टिकोण के अनुसार पेश किया है। परेश बरुआ ने तो उसे दो वर्षों के अंतराल (1935-37) में तीन भाषाओं- बांग्ला, हिन्दी और असमिया में बनाया था। फिल्म में सुधीर मिश्रा ने देवदास को बिल्कुल अलग तरह से पेश किया है। उन्होंने देव, पारो और चंद्रमुखी की कहानी को राजनीति की निर्मम पृष्ठभूमि में पेश किया है, जिसमें हर तरफ छल, षडयंत्र, हिंसा है, लेकिन प्रेम भी पूरी शिद्दत के साथ मौजूद है।

सुधीर मिश्रा ने देवदास से प्रेरणा तो ली है, लेकिन वह पूरी तरह उसी पर आश्रित नहीं हैं। उन्होंने शरदचंद्र के ‘देवदास’ में थोड़ा शेक्यपियर के ‘हैमलेट’को भी मिला दिया है और क्लाईमैक्स में थोड़ा ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ को भी डाल दिया है। एक तरह से देखें तो यह सुधीर मिश्रा की ‘दास देव’ देवदास की उल्टी यात्रा है। वह आबादी से बर्बादी की बजाय बर्बादी से आबादी की यात्रा तय करता है। और हां, इस फिल्म में चुन्नी लाल भी बिल्कुल अलग अंदाज में है। मिलन शुक्ला के रूप में। वह देव का दोस्त नहीं, उसने देव को चंद्रमुखी से नहीं मिलवाया है। वह चंद्रमुखी के यहां नहीं जाता, बल्कि पारो को चाहता है।देव प्रताप चौहान (राहुल भट्ट) उत्तर प्रदेश के एक रसूखदार राजनीतिक परिवार का उत्तराधिकारी है। उसके पिता विशंभर सिंह (अनुराग कश्यप) और चाचा अवधेश सिंह (सौरभ शुक्ला) अपने क्षेत्र के बड़े नेता हैं। पारो (रिचा चड्ढा) उसकी बपचन की दोस्त है। दोनों के पिता बहुत अच्छे दोस्त हैं और दोनों परिवारों में बहुत घनिष्ठ संबंध हैं। लेकिन चीजें अचानक बदल जाती हैं, जब एक दुर्घटना में देव के पिता विशंभर की मौत हो जाती है। देव को उसके चाचा पाल-पोस कर बड़ा करते हैं और चाहते हैं कि वह अपनी राजनीतिक विरासत को संभाले। लेकिन नशे की लत में बेसुध देव को इसमें दिलचस्पी नहीं है। उसकी बपचन की साथी पारो भी यही चाहती है। इस कहानी की चंद्रमुखी यानी चांदनी (अदिति राव हैदरी) राजनीतिक गलियारों में रसूख रखने वाली एक ऐसी लड़की है, जो अपने दिमाग, अपने हुस्न की बदौलत मुश्किल से मुश्किल काम निकलवा लेती है। वह अवधेश सिंह के दोस्त सहाय (दिलीप ताहिल) के साथ काम करती है और देव को चाहती है। वह कुछ ऐसे हालात रचती है कि देव अपने परिवार की राजनीतिक विरासत संभालने को तैयार हो जाता है। और जब देव का सामना ऐसी राजनीतिक गंदगी से होता है और ऐसे-ऐसे खुलासे होते हैं कि वह स्तब्ध रह जाता है... चांदनी का एक संवाद है- ‘राजनीतिक फिक्सिंग के साथ एक दिक्कत है कि आप सब कुछ फिक्स नहीं कर सकते।’देव को योजनाबद्ध तरीके से राजनीति के मैदान उतारने के मामले में भी यही होता है और कई चीजें सूत्रधारों के हाथ से निकल जाती हैं, जिनका परिणाम भयावह होता है।

निर्देशक सुधीर मिश्रा को डार्क सिनेमा और इंटेंस किरदार पसंद हैं। वह जटिल मानवीय पहलुओं के चित्रण में रुचि रखते हैं। ‘दास देव’ भी अपवाद नहीं है। इसमें भी उन्होंने राजनीतिक गंदगी के बीच प्रेम त्रिकोण को पेश किया है। राजनीति के छल-छद्मों को उन्होंने बहुत प्रभावशाली तरीके से पेश किया है और किरदारों को भी दिलचस्प तरीके से गढ़ा है। लेकिन पटकथा में कई खामियां हैं, जो ‘दास देव’ को यादगार फिल्म बनने से रोक देती हैं। कई प्रश्न के जवाब अधूरे रह जाते हैं। मसलन, जब रामाश्रय शुक्ला (विपिन शर्मा) अवधेश के बहुत वफादार थे तो उनकी राजनीतिक खिलाफत क्यों करते हैं, आदि आदि! फिल्म में कई गैर-जरूरी बातें भी हैं और कई बार यह अति नाटकीयता का शिकार भी होती है। लेकिन हां, सुधीर मिश्रा एक दिलचस्प कहानी पेश करने में जरूर सफल रहे हैं। फिल्म की गति तेज है और यह उबाती नहीं। दर्शकों की दिलचस्पी सामान्य तौर पर बनी रहती है।फिल्म के संवाद अच्छे हैं और गीत-संगीत भी विषय के अनुकूल है। बैकग्राउंड में चलने वाले गाने ठीक लगते हैं और बैकग्राउंड संगीत अच्छा है। देव के रूप में राहुल भट्ट प्रभावित करते हैं। अगर आपको डार्क सिनेमा पसंद है तो आपको यह फिल्म पसंद आएगी।


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