MOVIE REVIEW: फिल्म देखने से पहले पढ़ें कैसी है 'नानू की जानू'

By: Dilip Kumar
4/29/2018 12:04:53 AM
नई दिल्ली

कलाकार: अभय देओल, पत्रलेखा, मनु ऋषि, राजेश शर्मा, बृजेंद्र काला, मनोज पाहवा, रेशमा खान
निर्देशक: फराज हैदर
निर्माता: साजिद कुरेशी
लेखक: मनु ऋषि

‘हॉरर कॉमेडी’ सुनने में बड़ा अच्छा लगता है। डर के साथ हंसी। देखने में भी अच्छा लगेगा, अगर किसी फिल्म में दोनों को सही तरीके से मिलाया जाए तो। लेकिन उसके लिए अच्छी स्क्रिप्ट, अच्छा निर्देशन और अच्छा प्रस्तुतीकरण अनिवार्य शर्त है, वरना फिल्म ‘भानुमति का कुनबा’ बन कर रह जाती है। फराज हैदर निर्देशित अभय देओल की ‘नानू की जानू’ भी ऐसा ही ‘भानुमति का कुनबा’ है, जिसमें ‘कहीं का ईंट कहीं का रोड़ा’ लगा है।आनंद यानी नानू (अभय देओल) प्रॉपर्टी माफिया का एजेंट है। वह नोएडा में डब्बू (मनु ऋषि) और अपने कुछ सहयोगियों के साथ पहले मकान किराये पर लेता है, फिर उस पर कब्जा कर लेता है और मकान मालिक से औने-पौने दाम में जबर्दस्ती खरीद कर प्रॉपर्टी माफिया को दे देता है। एक दिन वह अपने काम के सिलसिले में अपनी गाड़ी से कहीं जा रहा होता है। रास्ते में उसे एक घायल लड़की सड़क पर पड़ी दिखती है। वह उसे अस्पताल ले जाता है, लेकिन लड़की बच नहीं पाती। इस घटना का उसके दिमाग पर बहुत गहरा असर पड़ता है। उसका अपने काम में मन नहीं लगता। उसके साथी उससे पहले की तरह दबंगों जैसा व्यवहार करने को कहते हैं, लेकिन वह नहीं कर पाता। एक दिन जब वह अपने किराये के मकान में पहुंचता है तो अजीबोगरीब घटनाएं होती हैं। फिर उसकी जिंदगी में हलचल मच जाती है...

हिट तमिल फिल्म ‘पिसासु’ पर आधारित इस फिल्म में यह पता ही नहीं चलता कि लेखक और निर्देशक का उद्देश्य क्या है! उन्होंने ट्रैफिक के नियमों को लेकर लोगों को जागरूक करने के लिए फिल्म बनाई है या मोबाइल के दुष्प्रभावों को बताने के लिए बनाई है, या फिर मशहूर हरियाणवी गायिका सपना चौधरी को पहली बार बड़े पर्दे पर दिखाने के लिए फिल्म बनाई है, समझना मुश्किल है। वैसे सपना चौधरी और अभय देओल पर फिल्माए गए गाने ‘तेरे ठुमके सपना चौधरी’ में भी कुछ खास दम नहीं है। स्क्रिप्ट की खामियों की तो बात ही छोड़ दीजिए, उसे गिनते-गिनते थक जाएंगे। न कहीं कोई ‘लॉजिक’ है, न कहीे कोई ‘मैजिक’ है। हां कहीं कहीं बैकग्राउंड म्यूजिक थोड़ा असर पैदा करता है, खासकर हॉरर दृश्यों में। कुछ सीन में कॉमेडी भी गुदगुदाती है। लेकिन कुल मिला कर फराज हैदर का निर्देशन जरा भी प्रभावित नहीं करता। गीत-संगीत में भी दम नहीं है।

अभय देओल अच्छे अभिनेता हैं और चुनिंदा फिल्में करने के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने यह फिल्म क्यों चुनी, समझ से परे है। फिल्म के शुरुआती दृश्यों में तो वह अच्छे लगे हैं, लेकिन बाद में प्रभाव खो देते हैं। पत्रलेखा का रोल बहुत छोटा और अप्रभावी है। राजेश शर्मा से निर्देशक उनकी क्षमता के मुताबिक काम नहीं ले पाए हैं। हिमानी शिवपुरी अपने पुराने अंदाज में ही हैं। बृजेंद्र काला भी अपने चिर-परिचित अंदाज में हैं, लेकिन अच्छे लगते हैं। फिल्म का सबसे सकारात्मक पहलू मनु ऋषि की कॉमेडी टाइमिंग है। वह प्रभावित करते हैं, लेकिन दूसरे हाफ में उनके रोल को काफी छोटा कर दिया गया है। मनु ऋषि इस फिल्म में बतौर अभिनेता तो सफल रहे हैं, लेकिन बतौर लेखक असफल।फिल्म के साथ सबसे बड़ी दिक्कत है कि यह न पूरी तरह हंसा पाती है, न डरा पाती है और न ही प्यार का अहसास जगा पाती है। बस टुकड़ों में मनोरंजन करती है। अगर आप बहुत थोड़े-से मनोरंजन के लिए भी पैसे खर्च करने को तैयार हैं तो फिल्म देख सकते हैं। अगर आपको ज्यादा की तमन्ना है तो इससे दूर रहना ही बेहतर है।


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