तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) के प्रमुख के. चंद्रशेखर राव (केसीआर) दूसरी बार राज्य के मुख्यमंत्री बने। गुरुवार को राज्यपाल ईएसएल नरसिम्हन ने राजभवन में उन्हें पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई। केसीआर ने लक्ष्मीनरसिम्हा स्वामी मंदिर के पंडितों के कहने पर शपथ के लिए दोपहर 1.25 बजे का वक्त चुना। पंडितों के मुताबिक, इस दौरान राज योग मुहूर्त था।
विधानसभा चुनाव में टीआरएस ने 119 में से 88 सीटों पर जीत दर्ज की है। केसीआर ने सिद्दीपेट जिले की गजवेल सीट से जीत हासिल की। शपथ समारोह से पहले केसीआर ने मंत्रिमंडल में सभी वर्गों को प्रतिनिधित्व देने की बात कही। तेलंगाना कैबिनेट में अधिकतम 18 सदस्य हो सकते हैं।
माना जा रहा है कि टीआरएस को दोबारा सत्ता में लाने के लिए राज्य में केसीआर की शुरू की गईं योजनाएं काफी अहम रहीं। केसीआर ने पैसा, शादी, मकान और पानी से जुड़ी कई योजनाएं शुरू कीं, जिनका सीधा लाभ वहां की जनता को मिला। केसीआर ने किसानों के लिए प्रति एकड़ 4 हजार रुपए नकद देने की योजना भी चलाई। रबी और खरीफ की फसल मिलाकर किसान को 8000 रुपए तक मिलते हैं।
तेलंगाना की सियासत में सबसे लोकप्रिय चेहरे के रूप में उभरे 64 वर्षीय के. चंद्रशेखर राव (केसीआर) ने कभी अपना सियासी सफर आंध्र प्रदेश में युवक कांग्रेस के कार्यकर्ता के रूप में शुरू किया था। उनके बारे में मशहूर है कि वह सियासी आहट वक्त से पहले महसूस कर लेते हैं और उनकी यही खसियत उन्हें लगातार आगे बढ़ाती गई। जिस वक्त एनटी रामाराव आंध्र प्रदेश में कांग्रेस को सत्ता से बेदखल करने के लिए अपनी नई पार्टी बना रहे थे, केसीआर ने यह भांप लिया था कि आंध्र की राजनीति का भविष्य यही पार्टी होगी। उन्होंने कांग्रेस छोड़कर तेलगू देशम के साथ जाने में जरा भी देर नहीं लगाई।
वह एनटी रामाराव सरकार में भी मंत्री रहे और बाद में जब टीडीपी की कमान रामाराव के दामाद चंद्रबाबू नायडू के हाथ आ गई तो वह उनके साथ भी रहे। नायडू सरकार में भी केसीआर को मंत्री पद मिलता रहा, लेकिन 2001 में केसीआर ने पृथक तेलंगाना राज्य की मांग को लेकर तेलंगाना राष्ट्र समिति नाम से अलग पार्टी बना ली। 2004 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ा और केंद्र में मंत्री बने। बाद में तेलंगाना राज्य के लिए दबाव बनाने के लिए उन्होंने कांग्रेस पार्टी से अपना रिश्ता तोड़ लिया।
2014 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस ने पृथक तेलंगाना राज्य की मांग स्वीकार कर ली। सियासी गलियारों में कहा जाता है कि कांग्रेस ने यह मांग केसीआर के इस भरोसे मानी थी कि पृथक राज्य के बनने पर वह अपनी पार्टी का कांग्रेस में विलय कर देंगे, लेकिन तेलंगाना राज्य के गठन की अधिसूचना जारी होते ही वह अपने इस वादे से मुकर गए।
तेलुगुदेशम पार्टी से शुरू किया सफर
के. चंद्रशेखर राव साल 1983 में तेलुगुदेशम पार्टी यानी टीडीपी में शामिल हो गए। 1985 में वह सिद्धीपेट जिले से चुनाव लड़े और जीत गए। इसके बाद वे चार बार लगातार इस सीट से जीतते रहे। इस दौरान 1987-88 में वे मंत्री भी रहे। इस दौरान उन्होंने अलग-अलग पद भी संभाले। 1997 से 1999 तक केंद्रीय मंत्री रहे और 1999-2001 तक आंध्रप्रदेश विधानसभा के उपाध्यक्ष भी रहे। इसी दौरान आंध्रप्रदेश में अलग राज्य की मांग ने जोर पकड़ी और तेलुगू साहित्य के छात्र रहे के. चंद्रशेखर राव ने अलग तेलंगाना राज्य के निर्माण की मांग करते हुए तेलुगुदेशम पार्टी से अलग हो गए।
2001 में बनाई अलग पार्टी
टीडीपी से अलग होने के बाद के. चंद्रशेखर राव ने 2001 में अपनी अलग पार्टी बनाई और इसका नाम रखा तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) ने गठन के तीन वर्षों के बाद साल 2004 में कांग्रेस के साथ मिलकर लोकसभा चुनाव के अखाड़े में उतरी और 5 सीटें जीतने में कामयाब रही। 2004 में केंद्र में आई यूपीए की सरकार में राव बतौर श्रम और नियोजन मंत्री नियुक्त हुए। इस बीच अलग राज्य के गठन के मसले पर उनकी यूपीए सरकार से नाराजगी और टकराव जारी रहा 2006 और 2008 में इस्तीफा भी दिया। हालांकि इसके बाद भी चीजें उनके मनमुताबिक नहीं हुईं और अंतत: 2009 में वे यूपीए से अलग हो गए।
लोकप्रियता की वजह
केसीआर तेलंगाना में दो वजहों से लोकप्रिय हुए। एक तो उन्होंने लोकलुभावन योजनाओं को परवान चढ़ाया और दूसरे राज्य में करीब 16 प्रतिशत आबादी वाले मुस्लिम वोटर्स के बीच अपनी पहुंच बनाई। इस मामले में वह सपा की बराबरी में माने जाते हैं।
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