झारखंड से देवेंद्र गौतम। झारखंड में 1932 के खतियान और आदिवासी अस्मिता की बात खूब की जाती है। राज्य के गठन के बाद अधिकांश समय मुख्यमंत्री की कुर्सी पर आदिवासी नेता ही विराजमान रहे हैं। लेकिन मुगलकाल से शुरू हुई आदिवासी ज़मीन की हेराफेरी आज भी जारी है। आदिवासी समुदाय के कई भुक्तभोगियों ने न्याय की गुहार लगाई है। दिलचस्प बात है कि ठगी और दबंगई के मामलों में हाई कोर्ट के एक वरिष्ठ अधिवक्ता का नाम आ रहा है जिन्हें कहीं न कहीं सत्ता का संरक्षण मिल रहा है।
उन भुक्तभोगियों में एक हैं ग्राम मीठा, हेहल के दीपक कच्छप वल्द बादल कच्छप। उन्होंने अनुसूचित जाति/जनजाति थाना में 17 अगस्त 2022 को कांड संख्या 56/2022, भादवि की धारा-419/420/467/468/471/504/506/120 बी एवं 3(1),एफ आर व जी एससी/एसटी एक्ट के तहत एक प्राथमिकी दर्ज करा रखी है। यह स्टेट (दीपक कच्छप) की ओर से अली असगर, मोहम्मद इस्लाम अनिल कुमार और एडवोकेट राजीव कुमार के खिलाफ है। दीपक कच्छप ने उपरोक्त आरोपियों पर आदिवासी ज़मीन को धोखा देकर बेचने, विरोध करने पर जाति सूचक गाली देने, जान से मारने की धमकी देने का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि इस मामले की सीआईडी जांच भी हुई लेकिन अभी तक उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई।
भुक्तभोगी दीपक कच्छप ने रांची उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश, बार काउंसिल के अध्यक्ष, निदेशक सीबीआई और राष्ट्रीय जनजाति आयोग को पत्र प्रेषित कर न्याय की गुहार लगाई है। पत्र में उन्होंने अधिवक्ता राजीव कुमार के कई आपराधिक ष़डयंत्रों में संलिप्त होने का हवाला दिया है। उसमें 31 जुलाई 2022 को कोलकाता में 50 लाख की रंगदारी वसूलने के क्रम में गिरफ्तारी शामिल है जिसका मामला हेयर स्ट्रीट थाना, कोलकाता में दर्ज है। श्री कच्छप के पत्र के मुताबिक अधिवक्ता राजीव कुमार के खिलाफ पीएमएलए का एक मामला रांची जिला एवं सत्र न्यायालय में 1978 से ही लंबित है।
ठाकुर गांव थाना, रांची के भुवनेश्वर साहु ने भी एडवोकेट राजीव कुमार पर जाली दस्तावेज़ के आधार पर करीब चार एकड़ आदिवासी ज़मीन खरीदने से संबंधित तीन मामले दर्ज कराए हैं। जिसमें अधिवक्ता की पत्नी शर्मिला सिंह के नाम पर 2022 में रांची सदर अनुमंडल अंतर्गत बुड़मू, हल्का 09, मौजा अडरा, थाना संख्या 89 स्थित खाता नंबर 202, प्लॉट संख्या-8081 रकबा 16 डिसमिल, खाता न. 21, प्लॉट-78, रकबा 1.5 एकड़ शामिल है। खतियान में यह भूखंड आदिवासी ज़मीन के रूप में दर्ज हैं। भुवनेश्वर साहु ने भी एक पत्र लिखकर न्याय की गुहार लगाते हुए कहा है कि वर्ष 2010 में उपायुक्त, रांची की जांच संख्या 01/2010 के आधार पर स्टेट बार काउंसिल ने इनके रौल को रद्द कर 5 हजार रुपये के आर्थिक दंड का आदेश जारी किया था। यह मामला वाद संख्या 5442/2017 के तहत सुप्रीम कोर्ट में लंबित है।
उल्लेख्य है राजीव कुमार की पहचान जनहित याचिका विशेषज्ञ अधिवक्ता के रूप में बनी हुई है। लेकिन इसकी आड़ में कई तरह के गोरखधंधों में लिप्त होने का आरोप है। कोलकाता में तो रंगदारी की रकम वसूलते रंगे हाथ गिरफ्तार के गए थे। फिर भी न उनपर कोई ठोस कार्रवाई हो रही है न आदिवासी समाज के पीड़ितों को त्वरित न्याय मिल पा रहा है।
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