कुलवंत कौर के साथ बंसी लाल की रिपोर्ट। एस.पी.एम. कॉलेज फॉर विमेन में 16-17 अप्रैल को “भारतीय आध्यात्मिकता के व्यापक परिप्रेक्ष्य में भारतीय भौतिकवाद” विषय पर एक दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन बड़े उत्साह और विद्वतापूर्ण गंभीरता के साथ किया गया। इस संगोष्ठी में भारतीय दर्शन और आध्यात्मिक चिंतन के क्षेत्र की कुछ प्रतिष्ठित विभूतियाँ एकत्र हुईं। कार्यक्रम की शुरुआत प्राचार्या डॉ. साधना शर्मा के स्वागत भाषण से हुई, जिन्होंने लोकायत/चार्वाक जैसी भारतीय भौतिकवादी परंपराओं की आज के आध्यात्मिक और बौद्धिक विमर्श में पुनर्विचार की प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला। टी.आई.सी. डॉ. विजय कुमार ने संगोष्ठी के विषय में संक्षिप्त विचार प्रस्तुत किए। संयोजक डॉ. अभिनंदन पांडेय ने संगोष्ठी की रूपरेखा साझा की। सह-संयोजक जितेन्द्र चंदोलिया ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया।
मुख्य वक्तव्य प्रो. सच्चिदानंद मिश्रा द्वारा दिया गया, जो भारतीय दर्शन के एक प्रख्यात विद्वान हैं। उन्होंने भारतीय चिंतन में भौतिकवादी और आध्यात्मिक परंपराओं के बीच गहरे अंतर्विरोध और संवाद की व्याख्या की। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि भारतीय भौतिकवाद को केवल आध्यात्मिकता के निषेध के रूप में नहीं, बल्कि भारत की विविध दार्शनिक विरासत के एक अनिवार्य अंग के रूप में समझना चाहिए। मुख्य अतिथि प्रो. रंजन कुमार त्रिपाठी, संयुक्त डीन कॉलेजेज़ एवं डीन ऑफ कॉलेजेज़, दिल्ली विश्वविद्यालय ने भी विद्यार्थियों को अपने विचारों से लाभान्वित किया।
प्रथम तकनीकी सत्र की अध्यक्षता प्रो. गोदाबरिश मिश्रा ने की, जो नालंदा विश्वविद्यालय में बौद्ध अध्ययन संकाय के डीन तथा आईसीपीआर के पूर्व सदस्य सचिव हैं। उन्होंने भौतिकवादी परंपराओं पर महत्वपूर्ण दृष्टिकोण प्रस्तुत किए। संगोष्ठी में प्रो. ऋषिकांत पांडेय, प्रो. अजय वर्मा, प्रो. लक्ष्मीकांत पाधी और प्रो. किस्मत कुमार सिंह जैसे प्रख्यात विद्वानों के विचारोत्तेजक व्याख्यान शामिल रहे, जिन्होंने शास्त्रीय दर्शन से लेकर समकालीन प्रासंगिकता तक के विविध विषयों को समाहित किया। इस आयोजन में लगभग 20 विश्वविद्यालयों के छात्र, शोधार्थी और प्राध्यापक सक्रिय रूप से सहभागी रहे, जिससे एक जीवंत बौद्धिक वातावरण का निर्माण हुआ।
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