नई दिल्ली(देवेंद्र गौतम)। जनता कर्फ्यू के बाद और लॉकडाउन तथा कर्फ्यू से पूर्व रेलों में और खासतौर पर बिहार की राजधानी पटना में बसों पर खचाखच भीड़ और बस की छतों पर भी यात्रियों के हुजूम को लेकर सोशल डिस्टेंसिंग का निर्देश ध्वस्त होता हुआ दिखा। पटना के पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों ने अपनी विवशता बताई। यह सब इतनी तेज़ी से हुआ कि लोगों को समय नहीं मिला। इसीलिए लॉकडाउन के पहले लोग अपने ठिकानों तक पहुंचने की आपाधापी में थे। बसें कम थीं। बहुत सी ट्रेनें पहले से ही बंद थीं। दिल्ली और अन्य महानगरों से रेलों में भीड़ उमड़ने का भी यही कारण था। वे रोजी-रोटी के लिए आए थे। जब घरों में ही कैद रहना है तो परदेश में क्यों। अपने घर पर बाल-बच्चों के साथ क्यों नहीं। यही मानसिकता काम कर रही थी। यहां सरकारी तंत्र समय पर पहलकदमी नहीं ले पाया। सरकार चाहती तो सार्वजनिक वाहनों की संख्या बढ़ाकर थोड़े-थोड़े यात्रियों को एक दूसरे से दूरी बनाकर उनके घर भिजवाने की व्यवस्था कर सकती थी या फिर उन्हें रोक सकती थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोगों से अनुरोध किया था कि जो जहां है वहीं रहे। लेकिन व्यावहारिक रूप से इसमें कठिनाई थी।
मान लीजिए 20 मार्च को कोई व्यक्ति लखनऊ या कानपुर से किसी कार्यवश दिल्ली आया। किसी होटल में ठहर गया। उसे पता चला कि 22 मार्च को जनता कर्फ्यू है। वह 22 को ठहर गया। 22 की रात को ही लॉकआउट की घोषणा हो गई। अब वह अनिश्चित काल तक होटल में तो ठहर नहीं सकता था। ट्रेन, बस. फ्लाइट सबकुछ बंद होने की घोषणा हो चुकी थी। ऐसी स्थिति में वह अगली ट्रेन या बस से वापस लौटना चाहेगा। होटल में वह लंबे समय तक रुक नहीं सकता था। इस तरह दो तीन सौ किलोमीटर की दूरी तक फंसे लोगों को सोशल डिस्टेंसिग का पालन करते हुए घर तक सुरक्षित पहुंचाने की व्यवस्था करना सरकार की जिम्मेवासी बनती थी। लेकिन इसपर तत्काल निर्णय नहीं लिया जा सका। दूसरी बात यह कि महानगरों से गावों की ओर लौटती भीड़ की जांच नहीं की गई थी। उन भीड़ में यदि कुछ संक्रमित लोग गावों में पहुंच गए और ग्रामीण भारत में कोरोना का संक्रमण पहुंच गया तो स्थिति को संभाल पाना मुश्किल हो जाएगा। इस बिंदु पर ध्यान नहीं दिया गया अथवा लापरवाही बरती गई। अभी भारत में संक्रमण की जांच के न समुचित केंद्र हैं न उपकरण।
कोरोना वायरस के तीसरे चरण में पहुंचने पर इसके फैलाव को रोकने के लिए जो कुछ किया जाना चाहिए था, निश्चित रूप से सरकार कर रही है। विपक्षी दलों और देश की आम जनता भी इसमें जितना योगदान सकती थी दे रही है। सभी लोग इस बात से अवगत हैं कि भारत में चिकित्सा व्यवस्था किसी बड़ी महामारी से निपटने में सक्षम नहीं है। ऐसे में इसे फैलने से रोकना ही एकमात्र उपाय है।
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