स्त्री सशक्तिकरण और बालिकाओं की आत्मनिर्भरता विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन

By: Dilip Kumar
3/28/2025 4:06:55 PM
नई दिल्ली

कुलवंत कौर के साथ बंसी लाल की रिपोर्ट। श्यामा प्रसाद मुखर्जी महिला महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग एवं ‘पहल’ के संयुक्त तत्वावधान में आंतरिक गुणवत्ता आश्वासन प्रकोष्ठ (IQAC) के अंतर्गत स्त्री सशक्तिकरण और बालिकाओं की आत्मनिर्भरता (साहित्य, समाज और मनोविज्ञान के परिप्रेक्ष्य में) विषय पर अंतर-अनुशासनिक दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। पहले दिन उद्घाटन सत्र में बीज वक्ता के रूप में प्रो. राकेश सिन्हा (पूर्व राज्य सभा सदस्य), विशिष्ट अतिथि प्रो. अनिल मिश्रा (अध्यक्ष, पहल) एवं प्रो. साधना शर्मा (प्राचार्या, श्यामा प्रसाद मुखर्जी महिला महाविद्यालय) की गरिमामय उपस्थिति रही। प्राचार्या प्रो. साधना शर्मा ने अपने स्वागत वक्तव्य में बताया कि स्त्री सशक्तिकरण हम सबके लिए बहुत महत्वपूर्ण है, स्त्री सशक्तिकरण से ही समाज सशक्त होगा, स्त्रियाँ आत्मनिर्भर बनेंगी और तभी समाज का पूर्ण विकास होगा।

प्रो. अनिल मिश्रा ने ‘पहल’ (बहुउद्देशीय सामाजिक सेवा संगठन) द्वारा किए जा रहे महत्वपूर्ण कार्यों से अवगत कराया। पहल संस्था विगत २२ वर्षों से महिलाओं और बालिकाओं के लिए काम कर उन्हें आत्मनिर्भर बनने में सहयोग कर रही है। महिला सशक्तिकरण की दिशा में बालिकाओं के कौशल संवर्धन का हर संभव प्रयास करती है। प्रो। राकेश सिन्हा ने अपने वक्तव्य में कुछ महत्वपूर्ण तथ्यों के माध्यम से स्त्री अधिकारों की बात की। इतिहास में महिलाओं की यथार्थ स्थिति से अवगत कराते हुए उनकी समस्याओं की ओर ध्यान आकर्षित किया, और कहा कि पहले की तुलना में आज महिलाओं की स्थिति में सकारात्मक परिवर्तन देखने को मिलता है लेकिन यह पर्याप्त नहीं हैं, इसलिए अभी हम सबको मिल कर महिला सशक्तिकरण के लिए और अधिक प्रयास करने होंगे।

प्रथम सत्र का विषय था स्त्री सशक्तिकरण और साहित्य : प्रतिरोध से परिवर्तन तक। जिसमें मुख्य वक्ता के रूप में प्रो. सुधा सिंह (अध्यक्ष, हिंदी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय), एवं पहले वक्ता के तौर पर प्रो. गोपेश्वर सिंह (पूर्व अध्यक्ष, हिंदी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय) एवं दूसरे वक्ता के रूप में डॉ. प्रवीण कुमार (एसोसिएट प्रोफ़ेसर, हिंदी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय) हमारे बीच मौजूद रहे। प्रो सुधा सिंह ने कहा कि भारतीय समाज में व्याप्त रूढ़िवादी मानसिकता स्त्री शिक्षा में रुकावट पैदा करती रही। साथ ही प्रो. सुधा ने भारत में स्त्रियों के विवाह की उम्र को लेकर बेहद महत्वपूर्ण सवाल खड़े किए और कहा कि 18 वर्ष की उम्र में महिलाएं न ही अपनी शिक्षा ग्रहण कर पाती हैं और न ही आत्मनिर्भर बन पाती हैं, इसलिए इस पर सोचने की आवश्यकता है।

प्रो. गोपेश्वर सिंह ने कहा कि पितृसत्तात्मक व्यवस्था के द्वारा ही स्त्री का शोषण होता है, जिसमें एक स्त्री के भीतर भी पुरुष बैठा रहता है। स्त्री को सशक्त होने लिए अपनी चेतना का अर्जित करना होगा। और कहा कि स्त्री को पुरुष के पीछे चलने के बजाय उसके साथ चलने की आवश्यकता है तभी समतामूलक समाज की स्थापना होगी। डॉ. प्रवीण कुमार ने अपने वक्तव्य में चिंता जताई और कहा कि आज भी महिलाएं अपने वर्क प्लेस में सुरक्षित नहीं हैं। और कहा कि स्त्रियों की लड़ाई पुरुष न होकर पुरुषवादी सोच से है। डॉ. प्रवीण ने साहित्य के अनेक उदाहरणों के माध्यम से स्त्री की बात की और कहा कि जो स्त्री विरोधी स्वर साहित्य में मौजूद हैं, उन्हें फिर से पढने की जरुरत है।
द्वितीय सत्र का विषय रहा विमर्शो के बीच झांकती स्त्री अस्मिता। जिसमें सत्र की अध्यक्षता की प्रो. अनिल राय (वरिष्ठ प्रोफ़ेसर, हिंदी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय) ने की। पहले वक्ता के रूप में प्रो. रबीन्द्र कुमार (समाजशास्त्र विभाग, इग्नू), दूसरी वक्ता प्रो. गरिमा श्रीवास्तव (भारतीय भाषा केंद्र, जेएनयू ) तीसरे वक्ता के रूप में डॉ. पल्लव (हिन्दू महाविद्यालय) उपस्थित रहे।

प्रो. गरिमा श्रीवास्तव ने अपने वक्तव्य में कहा कि साहित्य इतिहास में स्त्री लेखिकाओं की गहरी उपेक्षा की गई है। लेकिन साथ ही वे स्वीकार करती हैं कि 19 वीं सदी से लेकर 21 वीं सदी तक स्त्री के जीवन में सुखद परिवर्तन देखने को मिलते हैं। आज स्त्री लेखन के माध्यम से स्त्री अपने अनुभव लिख रही हैं और लोग उनके लिखे को ध्यान से पढ़ भी रहे हैं। प्रो. रबीन्द्र कुमार ने समाजशास्त्रीय दृष्टि से स्त्री अस्मिता की बात की और कहा कि स्त्री और पुरुष को मनुष्य मानने की जरुरत है। विभिन्न आंदोलनों के माध्यम से आज स्त्री ने अपने अधिकारों प्राप्त किया है। डॉ. पल्लव ने हिंदी कहानियों के माध्यम से स्त्री मुक्ति की बात कही साथ ही ग्लोबलाइजेशन में स्त्री पुरुष की स्थिति से अवगत कराया। प्रो. अनिल राय ने अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में कहा कि सबसे बड़ा दुःख पराधीनता का है और स्त्री पराधीनता के कारण ही पिछड़ी है। प्रो. अनिल ने स्त्री विमर्श के विभिन्न पड़ावों पर विस्तार से चर्चा की। सभी सत्रों के व्याख्यान महत्वपूर्ण और ज्ञानवर्धक रहे। कार्यक्रम का संचालन डॉ विभा नायक ने किया।


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