@ अकरम नई दिल्ली।संजय दत्त के जीवन पर बनी है। लेकिन यह उनकी पूरी जीवनी नहीं है, क्योंकि फिल्म मुख्य रूप उनके जीवन के दो घटनाक्रमों पर केंद्रित है। पहला घटनाक्रम है संजू के नशे की लत में फंसने और उससे उबरने का संघर्ष। दूसरा घटनाक्रम है 1993 के बम विस्फोट कांड में फंसने, जेल जाने, बाहर आने और फिल्म उद्योग में फिर से अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराना। हालांकि ये दोनों उनके जीवन की निर्णायक घटनाएं हैं, उनके जीवन को परिभाषित करने वाली घटनाएं हैं, लेकिन उनके जीवन में इसके अलावा भी कई महत्वपूर्ण बातें हैं। इनमें उनके निजी रिश्ते, पारिवारिक जीवन व फिल्मी जीवन में उतार-चढ़ाव आदि शामिल हैं।
बहरहाल ह्यसंजूह्ण फिल्म की बात करते हैं। फिल्म की शुरुआत एक ऐसे दृश्य से होती है, जिसमें एक लेखक डी.एन. त्रिपाठी (पियूष मिश्रा) संजय दत्त (रणबीर कपूर) की जीवनी लिखते हैं ह्यबापू और बाबाह्ण और उनकी तुलना महात्मा गांधी से करते हैं। बाबा यानी संजू बापू यानी महात्मा गांधी से अपनी तुलना पर नाराज हो जाते हैं और त्रिपाठी को मार कर भगा देते हैं। फिर खोज शुरू होती है एक ईमानदार जीवनी लिखने वाले की और इसके लिए चुना जाता है विनी (अनुष्का शर्मा) को, जो एक प्रसिद्ध जीवनीकार और लेखक है। लेकिन विनी संजय दत्त की कहानी लिखने से मना कर देती है। फिर उसे संजय अपनी कहानी लिखने को राजी करने के लिए अपने जीवन के बारे में बताते हैं और फिल्म आगे बढ़ती है।
यह कहानी संजय दत्त की तो है ही, सुनील दत्त की भी है, कि किस तरह वह तमाम लांछनों और बदनामियों के बावजूद अपने बेटे के साथ खड़े रहे। सिर्फ इसलिए नहीं कि वे एक बाप थे और उन्हें अपने बेटे से बेइंतेहा प्यार था, बल्कि इसलिए भी, कि उन्हें अपने बेटे की नीयत पर संदेह नहीं था। ह्यसंजूह्ण की कहानी किसी भी पैसे वाले घर के एक बिगड़ैल लड़के की कहानी हो सकती है, फर्क सिर्फ इतना है कि सबको सुनील दत्त जैसा पिता नहीं मिलता। निर्देशक राजकुमार हिरानी ने एक बाप और बेटे के रिश्ते को प्रभावी ढंग से पेश किया है। यह फिल्म दो दोस्तों- संजू और कमलेश (विकी कौशल) के रिश्तों की बानगी भी पेश करती है।
राजकुमार हिरानी ने संजय दत्त के जीवन के ज्यादा प्रसंगों को छुआ नहीं है। हां, जितना भी पेश किया है, वह मनोरंजक अंदाज में किया है। वह एक ऐसे निर्देशक हैं, जो दर्शकों की नब्ज जानते हैं। वह अपनी फिल्मों में गंभीर बात भी मजाकिया लहजे में धारदार तरीके से पेश करने के लिए जाने जाते हैं। हालांकि कई जगहों पर अति नाटकीयता भी है। फिल्म में कई जगह द्विअर्थी संवाद भी हैं। संजय दत्त का जीवन तो अपने आप में ह्यमसालेदारह्ण है, हिरानी ने इसमें और भी मसाला डाला है। लेकिन एक दृश्य बहुत खटकता है- जेल में शौचालय का गंदा पानी संजू की कोठरी में आने का दृश्य। यह घृणा पैदा करता है। फिल्म में एक बात और खटकती है। उत्तरार्ध में फिल्म को देखते हुए बारबार ऐसा लगता है कि संजय दत्त की दुर्दशा की जिम्मेदार केवल और केवल मीडिया है। खैर, बतौर निर्देशक हिरानी अपनी पिछली फिल्मों के मुकाबले ह्यसंजूह्ण में कुछ कमजोर नजर आते हैं।
किरदारों के गेटअप पर काफी मेहनत की गई है। संजय का लुक तो लोग पहले पोस्टर और ट्रेलर में देख ही चुके हैं। नर्गिस दत्त के रूप में मनीषा कोईराला, मान्यता दत्त के रूप में दीया मिर्जा और प्रिया दत्त के रूप में अदिति सेइया का गेटअप भी अच्छा है। हालांकि सुनील दत्त के रूप में परेश रावल का गेटअप उतना नहीं जमता। फिल्म की सिनमेटोग्राफी अच्छी है। एडिटिंग थोड़ी और कसी हो सकती थी। ह्यकर ले मैदान फतेहह्ण गाना असर छोड़ता है। वैसे कुल मिला कर संगीत हिरानी की दूसरी फिल्मों के मुकाबले कमजोर है।
संजय दत्त के रूप में रणबीर कपूर ने शानदार अभिनय किया है। यह कहने में कोई गुरेज नहीं कि अपनी पीढ़ी के स्टारों में वह सबसे समर्थ अभिनेता है। इस फिल्म के लिए उन्होंने काफी मेहनत की है और वह हर दृश्य में दिखती भी है। किसी जीवित अभिनेता, जो अभी भी फिल्मों में सक्रिय है और लोकप्रिय है, का किरदार निभा ले जाना बहुत बड़ी चुनौती है। इस चुनौती को रणबीर ने सफलतापूर्वक निभाया है। उन्हें देखते हुए ऐसा लगता है, मानो संजय दत्त को देख रहे हैं। परेश रावल का अभिनय अच्छा है, लेकिन वह कई बार सुनील दत्त की जगह परेश रावल ज्यादा नजर आते हैं। विकी कौशल अच्छे अभिनेता हैं और हर किरदार में अपनी छाप छोड़ते हैं। अनुष्का शर्मा का अभिनय इन दिनों बहुत एक जैसा ही लगता है। इस फिल्म में भी वह ह्यपीकेह्ण के पत्रकार जैसी ही लगती हैं।
मान्यता दत्त के रूप में दीया मिर्जा ठीक हैं। मनीषा कोईराला, सोनम कपूर (संजू की पहली प्रेमिका रुबी), बोमन ईरानी (रुबी के पिता) और जिम सर्ब (संजू को ड्रग्स की आदत लगाने वाला) की भूमिकाएं छोटी हैं, लेकिन तीनों अपनी भूमिका में ठीक हैं। बाकी कलाकार भी ठीक हैं।
यह फिल्म संजय दत्त के प्रति दर्शकों के मन में सहानुभूति पैदा करती है। उन्हें एक भावुक और एक ऐसे आदमी के रूप में पेश करती है, जिसकी आदतें भले ही बुरी हैं, लेकिन वह आदमी बुरा नहीं है। शायद यही इस फिल्म का उद्देश्य भी है। तो इस लिहाज से फिल्म अपने मकसद में कामयाब है।
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