भारतीय संस्कृति गंगा की अविरल धारा और किनारों से जन्मी ऐसा माना जाता है, हां गंगा श्रेष्ठ है मगर नर्मदा ज्येष्ठ है। विंघ्याचल और सतपुड़ा के पहाड़ और जंगल हिमालय से पुराने हैं। समझा जाता है कि जब कोलाहल नहीं रहता तब कलरव सुनायी देता है। इसी तरह कविता भावात्मक शब्दों की ध्वनि है, जिसे आप शुभेष शर्मन के वंदे मॉं नर्मदे में पाते हैं।
वंदे मॉं नर्मदे मेरी दृष्टि में या मेरी चेतना में हिन्दी भाषियों की जातीय अस्मिता से जोड़ती है। जैसे निराला की राम की शक्तिपूजा में योग और वेदांत में भिन्न एक तत्व भक्ति का है, और भक्ति पूरी शक्ति के साथ वहां और वंदे मॉं नर्मदे में उपिस्थति है। वैसे भी ज्ञान का शिखर वेदांत है, विश्वमैत्री इसकी शिक्षा और पूर्णता इसके प्राण है। उसी तरह समाहित भक्ति इस रचना को हिन्दू मान्यताओं के अंग-प्रत्यंगों में स्थान दिलाकर रहेगी। भाषा और भावों के भीतर से यथार्थ हिन्दुत्व के जितने अच्छे चित्र, उदार और मनोहर वंदे मॉं नर्मदे में मिलते हैं, वे तुलसीदास को छोड़कर और कही नहीं मिलते।
नर्मदा का महात्म्य और उसकी विविध छबियां अंकन का विषय रही है। सहस्त्रधारा के सामने पहुंचकर पारिजातक जैसा दूधिया पानी आप में सहज ही प्रणम्य भाव जगा देता है। नदी की डाली के ये प्रपात उसके पुष्प ही तो है। वैसे हमारे मंदिरों की तरह हमारी नदियां पूर्वाभिमुख हैं, बड़ी नदियों में सिर्फ नर्मदा ही है जो पश्चिमाभिमुख है।
नर्मदा पुराणों की कुहेलिका से उभरकर आती है। वह शिव-तनया है। पौराणिक आख्यानों के अनुसारकिसी समय स्वानुगत रुप में नर्मदा नीलकंठ से निसृत हुई। तत्काल ही वे शिव तपस्विनी हो गई। यौवन दीप्त, स्निग्ध-श्यामल ऋजु देह को तपानुशासन में देखकर भगवन शिव ने कहा तुम अमृतमयी, आकांक्षानुरुप चिरकुमारी होगी। मुझे सदैव अपने निकट पाओगी। प्रपात बहुला नर्मदा का सबसे पहला और ऊॅंचा प्रपात कपिलधारा है। जहां कबीर,नानक, शंकर ने साधना की।
नानक तो वर्षों जबलपुर के ग्वारीघाट रहे। नर्मदा आधे दिन में अमरकंटक का पहाड़ उतर जानी है फिर आरंभ होता है। 75 किमी का डिंडौरी तक का मैदान। इसके तट पर मुंडी और अन्यान्य क्षेत्रों में सैला,रीना और करमा नृत्य, लोकनृत्य खेले जाते हैं। वहीं जहां पेड़-पत्तियों से स्वर लेकर रंभाते हैं और हवाएं हहराती हैं। धुआंधार से नर्मदा संगमरमर में मर्मर स्वर में संवाद करती उसकी तंग घाटी से बहती है। इकहरे बदन की तन्वन्गी आ गए हैं।
इसी तरह ओंकारेश्वर, पहाड़ी नदी का पहाड़ी तीर्थ। यहीं शंकर ने गुरु गोविंदपाद के आश्रम में रहकर विद्याभ्यास किया था। यहीं एक तरफ है कावेरी और दूसरी तरफ है नर्मदा। बहनों का स्नेह भी और रुठना भी। आगे फिर वे मिल जाती हैं। जहां तक शुभेश शर्मन की इस भाव गम्य कविता यात्रा का ताल्लुक है, इस लोक में स्टीफन स्पेंडर याद आता है कि काव्य-रचना से दूर बैठकर उस पर फैसले देने का हक मुझे या किसी और को नहीं पहुंचता।
अधिक से अधिक कविता के भीतर उतरकर बड़ी से बड़ी कठिन प्रक्रिया से गुजरकर हम उस प्रक्रिया का आभास पा सकते हैं जो कविता रचना के खातिर स्वयं को बदलने के लिए कवि को समर्पित होनी है। जैसे-
चंद्रकांति,चंद्रोदित आभा पुलकित पंकज पावनमयपुंज पूर्णिमा पूर्ण पुरातनभवपूरित भव भावनमय यामनहर मीना मनुहार मणिरस राजमयी रंजित रचतादेवासी देव दया-दिव्यादृष्टि, दारिद्रय, दमन, द्रव्या
आशय साफ है कि यह पुस्तक समर्पित संवेदन संसार की रचना करती है। वंदे मॉं नर्मदे नितांत निजी लेकिन कोमल भावभूमि पर ठिठकती सांस्कृतिक और भाव-पूर्ण लोक का निर्माण करती है। स्पष्ट है कि बालडांसी कविताओं से इतर यह काव्य सरणि का अनुगमन है। रीड जैसे आलोचक ने कहा है कि कवि को जो आकस्मिक उपादान मिले हैं। वे अनायास और असंबद्ध रुप में मन के कबाड़खाने में पड़े हुए नहीं है। वह उन्हें सचेत रुप में संवेदित प्रज्ञा और प्रखर जिज्ञासा की अनिवार्यता में ग्रहण करना है। शब्द और अर्थ की सार्थक मैत्री कविता का आधार है। इसे आप हर पृष्ठ पर देख सकते हैं।
सर्जक वही तो है जो अतीत की जीवंत पुनर्सृष्टि करे। जैसे डॉ. रामविलास जी मानते रहे कि आधुनिकता के प्रवाह में हमारे आम-जन उनकी अपनी बनाई व्यवस्थाएं, तीज-त्योहार सब भुला बैठे हें, ऐसे में शुभेश शर्मन के यहां पद और पदार्थ मिलकर एक खूबसूरत स्तुति-लोक खड़ा करते हें और शब्दों की नई अर्थवत्रा खोजे हैं, लेकिन शब्दों की लाटानुप्रासी आंच जिसमें रचना और रचनाकार पकता दिखाई देता है, अपने संप्रेस्य में अत्यंत दुरुह हो जाती है। इसलिए वह प्रार्थना की अंजुरी से रिसती भी है। नर्मदा में गति है, उद्दाम वेग है, स्वाद है, स्वाभिमान है, कथाएं हैं, वह चिरनूतन है और यही कारण है कि उसकी परिक्रमा भगवान शंकर की परिक्रमा समझी जाती है, की जाती है।
आद्य शंकराचार्य ने लिखा-
सबिन्द सिंधु सुस्ख्लत्त रंग भंग रंजितम्... त्वदीय पाद पंकज नमामी देवी नर्मदे
यमदूत और कालभूतों के भय का हरण करके रक्षा करने वाली मॉं नर्मदा देवी! अपने जलकणाों द्वारा समुद्र की उछलती हुई लहरों में रोचक दृश्य उत्पन्न करने वाले तथा शत्रुओं के भी पापों को नाश करने वाले आपके निर्मल जल वाले चरणकमलों को मैं नमस्कार करता हूं। यह काव्यानुभूति पारंपरिक काव्य से भी बिसरा दी गई लगती है। फिर भी आज लिखा जा रहा है
जैसे डॉ. प्रार्थना का गीत-
लक्ष्य धीर-पीर-मान योग्यता व गुणआपके ही पंकजा धुले हुए चरणमोड़ दें जो मुख प्रलय का मातु नर्मदेमुझको दान दे अभय का मातु नर्मदेकर दे नाश सब अनय का मातु नर्मदे
औपनिषदिक रुपक में कहें तो भाषा मन की लहर है। संस्कृत में कहते हैं सर्वं पश्यति स पश्यति जो सबको देखता है वह सब देखता है। एक ईश्वर और रचना के लिए पाठक। इसके अर्थगांभीर्य, भावमाधुर्य और निमिलत शब्द योजना की स्तुति वही समझ सकता है जिसकी आस्था जीवंत हो।
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