अगस्त का महीना भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की अमर गाथाओं का स्मरण कराता है। 9 अगस्त को 'भारत छोड़ो आंदोलन' और 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस के ऐतिहासिक अवसर से पूर्व राजधानी दिल्ली के प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में अखिल भारतीय स्वतंत्रता सेनानी परिवार संघ द्वारा स्वतंत्रता सेनानी कॉमरेड सरदार गुरचरण सिंह लाधुपुर तथा स्वतंत्रता सेनानी डॉ. इकबाल सिंह साहनी की जन्मशती वर्ष के अवसर पर श्रद्धांजलि एवं विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया।
"75 वर्ष होने को आए... कैसा भारत वे चाहते थे?" विषय पर आयोजित इस कार्यक्रम में स्वतंत्रता सेनानियों के सपनों के भारत, उनके आदर्शों तथा वर्तमान भारत की चुनौतियों पर गंभीर एवं सार्थक विमर्श हुआ। कार्यक्रम के संयोजक डॉ. जे. पी. सिंह साहनी ने कहा कि जिन स्वतंत्रता सेनानियों ने अपना सर्वस्व त्यागकर देश को आजादी दिलाई, उनके योगदान को नई पीढ़ी तक पहुँचाना आज समय की एक महत्वपूर्ण आवश्यकता है। उन्होंने चिंता व्यक्त की कि स्वतंत्रता सेनानियों और उनके परिवारों को वह राष्ट्रीय सम्मान और पहचान नहीं मिल रही, जिसके वे वास्तविक रूप से अधिकारी हैं।
उन्होंने कहा कि सार्वजनिक संस्थानों, सड़कों और स्मारकों के नामकरण में स्वतंत्रता सेनानियों को समुचित स्थान दिया जाना चाहिए। उनके संघर्ष, त्याग और राष्ट्र निर्माण में योगदान को शिक्षा, संस्कृति और जनजीवन का स्थायी एवं सम्मानजनक हिस्सा बनाया जाना आवश्यक है। विश्व प्रसिद्ध शिक्षाविद डॉ. संदीप मारवाह ने स्वतंत्रता सेनानियों के आदर्शों को युवाओं तक पहुँचाने में शिक्षा, मीडिया और सांस्कृतिक माध्यमों की महत्वपूर्ण भूमिका पर बल दिया।
कार्यक्रम में वक्ताओं ने कहा कि स्वतंत्रता केवल एक राजनीतिक उपलब्धि नहीं, बल्कि एक सामाजिक उत्तरदायित्व भी है। यदि देश को स्वतंत्रता सेनानियों के सपनों के अनुरूप विकसित करना है, तो गरीबी, प्रदूषण, महिलाओं की सुरक्षा, किसानों की समस्याएँ, युवाओं का रोजगार, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएँ, न्याय व्यवस्था, सड़क सुरक्षा, जल संकट, पर्यावरण संरक्षण और सुशासन जैसे विषयों पर गंभीर एवं सतत प्रयास आवश्यक हैं।
वरिष्ठ पत्रकार आलोक कुमार ने कहा कि स्वतंत्रता सेनानियों के योगदान को स्मरण करना केवल इतिहास का सम्मान नहीं, बल्कि भविष्य के लिए मार्गदर्शन भी है। उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी को स्वतंत्रता सेनानियों के परिवारों से उनके संघर्ष, साहस, रणनीति और बलिदान की वास्तविक कहानियाँ अवश्य सुननी चाहिए, जिससे राष्ट्रभक्ति, धैर्य और नेतृत्व की प्रेरणा प्राप्त होती है।
कार्यक्रम में यह भी रेखांकित किया गया कि स्वतंत्रता सेनानियों का सम्मान केवल औपचारिक श्रद्धांजलि तक सीमित नहीं रहना चाहिए। उनके आदर्श—राष्ट्रभक्ति, ईमानदारी, समानता, सामाजिक न्याय, राष्ट्रीय एकता और जनसेवा—देश के सामाजिक एवं सार्वजनिक जीवन का अभिन्न अंग बनने चाहिए। इस अवसर पर मेजर जनरल लखविंदर सिंह (सेवानिवृत्त), ब्रिगेडियर बी. के. खन्ना (सेवानिवृत्त), कर्नल दिवेंद्र सहरावत, वरिष्ठ अधिवक्ता एन. डी. पंचोली, प्रोफेसर राम सिंह, डॉ. बनिंदर राही, वरिष्ठ पत्रकार आलोक कुमार सहित अनेक विशिष्ट अतिथि उपस्थित रहे।
कार्यक्रम का समापन सामूहिक संकल्प के साथ हुआ। सभी प्रतिभागियों ने स्वतंत्रता सेनानियों की विरासत को संरक्षित करने, उनके आदर्शों को नई पीढ़ी तक पहुँचाने तथा केंद्र एवं राज्य सरकारों से स्वतंत्रता सेनानियों और उनके परिवारों को राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान, पहचान और संस्थागत संरक्षण प्रदान करने की मांग की। गोष्ठी में उपस्थित वक्ताओं का मत था कि 9 अगस्त 'भारत छोड़ो आंदोलन' की भावना और 15 अगस्त स्वतंत्रता दिवस का वास्तविक संदेश तभी सार्थक होगा, जब राष्ट्र अपने स्वतंत्रता सेनानियों के त्याग को केवल इतिहास के पन्नों तक सीमित न रखकर उसे वर्तमान नीतियों, शिक्षा व्यवस्था और सामाजिक चेतना में भी समान सम्मान प्रदान करेगा।
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