जगन्नाथ पुरी की मेरी यात्रा का सबसे बड़ा आकर्षण था भगवान श्रीजगन्नाथ की बहुड़ा रथयात्रा में भाग लेना और उसके बाद सुना बेस (स्वर्ण वेश) के दिव्य दर्शन करना। लाखों श्रद्धालुओं के बीच जब भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और माता सुभद्रा अपने-अपने रथों पर विराजमान थे और स्वर्ण आभूषणों से अलंकृत भगवान के दर्शन हुए, तब मन श्रद्धा और भक्ति से भर उठा। रथयात्रा की भव्यता, "जय जगन्नाथ" के गूंजते जयघोष और श्रद्धालुओं की आस्था ने इस यात्रा को जीवन का अविस्मरणीय अनुभव बना दिया।
लेकिन मेरी आध्यात्मिक यात्रा यहीं समाप्त नहीं हुई। अगले दिन मैंने पुरी से लगभग 25 किलोमीटर दूर ब्रह्मगिरि स्थित अलारनाथ मंदिर जाने का निर्णय लिया। स्थानीय लोगों का कहना था कि यदि पुरी आए हैं और अलारनाथ नहीं गए, तो यात्रा अभी अधूरी है। पुरी की चहल-पहल पीछे छूटती गई और सड़क के दोनों ओर फैली हरियाली के बीच हमारी गाड़ी ब्रह्मगिरि की ओर बढ़ने लगी। कुछ ही समय बाद प्राचीन अलारनाथ मंदिर के शिखर दिखाई देने लगे। मंदिर परिसर में प्रवेश करते ही एक अलग ही अनुभूति हुई। यहां न रथयात्रा जैसी भीड़ थी और न ही शोर-शराबा। वातावरण में केवल भक्ति, शांति और आध्यात्मिक ऊर्जा का अनुभव हो रहा था।
अलारनाथ मंदिर का महत्व केवल इसकी प्राचीनता में नहीं, बल्कि भगवान जगन्नाथ से इसके गहरे आध्यात्मिक संबंध में भी है। स्नान पूर्णिमा के बाद जब भगवान जगन्नाथ अनवसर काल में सार्वजनिक दर्शन नहीं देते, तब लाखों श्रद्धालु अलारनाथ मंदिर पहुंचते हैं। मान्यता है कि इसी अवधि में भगवान अपने भक्तों को अलारनाथ स्वरूप में दर्शन देते हैं। मंदिर के गर्भगृह में भगवान विष्णु के अलारनाथ स्वरूप के दर्शन करते समय मन में अनायास यही भाव आया कि रथयात्रा में जिस विराट स्वरूप के दर्शन हुए थे, यहां वही ईश्वर अत्यंत शांत और आत्मीय रूप में अपने भक्तों के बीच विराजमान हैं। यह अनुभव शब्दों में व्यक्त करना आसान नहीं है।
अलारनाथ मंदिर श्री चैतन्य महाप्रभु की स्मृतियों से भी जुड़ा हुआ है। कहा जाता है कि जगन्नाथ के विरह में व्याकुल महाप्रभु अनवसर काल में यहीं आए थे और भगवान के दर्शन कर भाव-विभोर हो गए थे। मंदिर परिसर में आज भी उस पवित्र शिला को श्रद्धा से देखा जाता है, जिस पर उनके दंडवत प्रणाम की छाप होने की मान्यता है। मंदिर में दर्शन के बाद प्रसिद्ध खीर महाप्रसाद का स्वाद लेने का अवसर मिला। मिट्टी के पात्र में परोसी गई यह खीर केवल एक प्रसाद नहीं, बल्कि सदियों पुरानी परंपरा और श्रद्धा का प्रतीक है। इसकी सादगी और स्वाद दोनों मन में बस गए।
इस पूरी यात्रा ने मुझे एक महत्वपूर्ण संदेश दिया। रथयात्रा भगवान की लोकमंगल यात्रा है, जहां वे स्वयं अपने भक्तों के बीच आते हैं। वहीं अलारनाथ की यात्रा उस अंतरंग भक्ति का अनुभव कराती है, जहां श्रद्धालु और भगवान के बीच केवल प्रेम, विश्वास और आत्मिक संवाद रह जाता है।
जब मैं ब्रह्मगिरि से वापस पुरी लौट रहा था, तब मन में यही विचार था कि जगन्नाथ धाम की यात्रा केवल मंदिर दर्शन या रथयात्रा तक सीमित नहीं है। अलारनाथ जैसे तीर्थ इस आध्यात्मिक यात्रा को पूर्णता प्रदान करते हैं। यदि आप भी कभी जगन्नाथ पुरी जाएं, तो रथयात्रा और सुना बेस के दर्शन के साथ अलारनाथ अवश्य जाएं। संभव है कि वहां आपको केवल भगवान के दर्शन ही नहीं, बल्कि स्वयं से मिलने का अवसर भी मिल जाए।
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