अलारनाथ भगवान के शांत, सौम्य और आत्मा को तृप्त कर देने वाले दर्शन के बाद हमारी यात्रा पुरी से भुवनेश्वर की ओर मुड़ गई। सड़क के दोनों ओर धान के हरे-भरे खेत, बीच-बीच में नारियल और ताड़ के वृक्ष, छोटे-छोटे गाँव और मंदिरों के शिखर मानो बता रहे थे कि हम उस भूमि पर चल रहे हैं जहाँ इतिहास और आस्था साथ-साथ सांस लेते हैं।
करीब साठ किलोमीटर की यात्रा के बाद हम पहुँचे भुवनेश्वर के उस प्राचीन मंदिर में, जिसे वैष्णव परंपरा की अमूल्य धरोहर माना जाता है-अनंत वासुदेव मंदिर। भुवनेश्वर को मंदिरों का शहर और भगवान शिव की नगरी कहा जाता है। यहाँ लिंगराज, मुक्तेश्वर, राजारानी और ब्रह्मेश्वर जैसे सैकड़ों प्राचीन मंदिर हैं। ऐसे शैव वातावरण के बीच भगवान श्रीकृष्ण का यह भव्य मंदिर अपने आप में एक अद्भुत संदेश देता है कि सनातन परंपरा में शिव और विष्णु अलग नहीं, बल्कि एक ही परम सत्य के दो स्वरूप हैं।
मंदिर के विशाल शिखर को देखते ही ऐसा लगता है जैसे समय लगभग आठ सौ वर्ष पीछे लौट गया हो। तेरहवीं शताब्दी में पूर्वी गंगा वंश के शासनकाल में राजकुमारी चंद्रिका देवी द्वारा निर्मित यह मंदिर आज भी अपनी भव्यता के साथ खड़ा है। मान्यता है कि इस स्थान पर पहले से भगवान विष्णु की पूजा होती थी। उसी प्राचीन आस्था को भव्य स्वरूप देने के लिए इस मंदिर का निर्माण कराया गया।
मंदिर का स्थापत्य पहली ही दृष्टि में प्रभावित करता है। इसकी बनावट लिंगराज मंदिर से मिलती है, लेकिन जैसे-जैसे आप दीवारों को देखते हैं, वैष्णव परंपरा की छाप स्पष्ट होने लगती है। पत्थरों पर उकेरी गई देव प्रतिमाएँ, अलंकृत स्तंभ, शिखर की कलात्मक रचना और गर्भगृह की गंभीरता, सब मिलकर एक ऐसा वातावरण बनाते हैं जहाँ इतिहास केवल पढ़ा नहीं जाता, महसूस किया जाता है।
गर्भगृह में प्रवेश करते ही सामने भगवान वासुदेव (श्रीकृष्ण), उनके बड़े भ्राता बलराम (अनंत) और बहन सुभद्रा के दिव्य दर्शन होते हैं। पुरी के श्रीजगन्नाथ मंदिर की तरह यहाँ भी यही त्रिमूर्ति विराजमान है, लेकिन एक बड़ा अंतर है। पुरी में भगवान के विग्रह दारु अर्थात पवित्र काष्ठ से निर्मित हैं, जबकि यहाँ तीनों देवताओं की पूर्णाकार काले ग्रेनाइट पत्थर की प्रतिमाएँ स्थापित हैं। बलराम सात फनों वाले शेषनाग की छत्रछाया में खड़े हैं, श्रीकृष्ण के हाथों में शंख, चक्र, गदा और कमल हैं तथा सुभद्रा का शांत और मातृवत स्वरूप भक्तों को सहज आकर्षित करता है।
दर्शन के बाद हमारी अगली मंजिल थी मंदिर का रसोईघर। दक्षिण भारत और ओडिशा के अनेक मंदिरों की तरह यहाँ भी भगवान के लिए प्रतिदिन पारंपरिक विधि से भोग तैयार किया जाता है। मिट्टी के बर्तनों में लकड़ी की आग पर पकता भोजन, मसालों की सोंधी महक और रसोई की निरंतर चलती गतिविधियाँ देखकर लगा कि यह केवल भोजन नहीं, बल्कि सदियों पुरानी एक जीवंत परंपरा है।
मंदिर का महाप्रसाद यहाँ आने वाले हर श्रद्धालु के लिए विशेष आकर्षण है। चावल, दाल, विभिन्न प्रकार की सब्जियाँ, खिचड़ी, खट्टा, मीठे व्यंजन और पारंपरिक ओड़िया पकवान भगवान को अर्पित किए जाते हैं। प्रसाद का स्वाद केवल स्वादेंद्रियों को ही नहीं, मन को भी तृप्त करता है। मिट्टी के बर्तनों में बने इस भोजन में कृत्रिमता का कोई स्थान नहीं; इसमें केवल सादगी, शुद्धता और श्रद्धा का स्वाद मिलता है। प्रसाद ग्रहण करते समय सहज ही पुरी के महाप्रसाद की परंपरा स्मरण हो आती है, यद्यपि यहाँ का वातावरण अपेक्षाकृत शांत और कम भीड़भाड़ वाला है।
मंदिर से बाहर निकलते ही सामने पवित्र बिंदु सागर दिखाई देता है। मान्यता है कि यहाँ भारत की अनेक पवित्र नदियों का आध्यात्मिक संगम है। श्रद्धालु पहले बिंदु सागर के दर्शन करते हैं और फिर भगवान अनंत वासुदेव की शरण में पहुँचते हैं। हवा में घुली धूप और चंदन की सुगंध, मंदिर की घंटियों की अनुगूंज और सरोवर की शांति मिलकर एक ऐसा वातावरण रचते हैं जिसे शब्दों में पूरी तरह बाँध पाना कठिन है।
लेकिन इस आध्यात्मिक आनंद के बीच मन में एक कसक भी उठती है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा संरक्षित यह लगभग आठ सौ वर्ष पुराना मंदिर आज संरक्षण की चुनौतियों से जूझता दिखाई देता है। कई स्थानों पर पत्थरों का क्षरण स्पष्ट है। समय, मौसम और बढ़ते मानवीय दबाव का प्रभाव मंदिर की संरचना पर दिखाई देता है। मंदिर परिसर की परंपरागत रसोई भी लंबे समय से संरक्षण विशेषज्ञों के बीच चर्चा का विषय रही है। इतने महत्वपूर्ण स्मारक को देखकर सहज ही मन में प्रश्न उठता है कि क्या हमारी इस अनमोल सांस्कृतिक धरोहर को और अधिक वैज्ञानिक, संवेदनशील और दीर्घकालिक संरक्षण की आवश्यकता नहीं है?
अनंत वासुदेव मंदिर से विदा लेते समय लगा कि यह केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि ओडिशा की सांस्कृतिक चेतना का जीवंत अध्याय है। यहाँ श्रीकृष्ण हैं, बलराम हैं, सुभद्रा हैं; इतिहास है, स्थापत्य है, महाप्रसाद की परंपरा है और वह आध्यात्मिक शांति भी, जिसे कोई कैमरा पूरी तरह कैद नहीं कर सकता।
अलारनाथ से आरंभ हुई हमारी यात्रा ने अनंत वासुदेव में एक नया अर्थ पाया। एक ओर विरह में भक्तों के बीच विराजमान अलारनाथ, दूसरी ओर शिवनगरी के मध्य श्रीकृष्ण का यह वैभव-दोनों मिलकर बताते हैं कि ओडिशा केवल मंदिरों की भूमि नहीं, बल्कि भारत की सनातन आत्मा का जीवंत मानचित्र है।
अलारनाथ भगवान के शांत, सौम्य और आत्मा को तृप्त कर देने वाले दर्शन के बाद हमारी यात्रा ..Read More
जगन्नाथ पुरी की मेरी यात्रा का सबसे बड़ा आकर्षण था भगवान श्रीजगन्नाथ की बहुड़ा रथयात्र ..Read More
राजधानी के प्रतिष्ठित स्थल भारत मंडपम में 5 अप्रैल 2026 को महावीर कथा 3.0 का भव्य एवं ..Read More
कुलवंत कौर के साथ बंसी लाल की रिपोर्ट। देश-विदेश में ख्याति प्राप्त लव कुश रामलील ..Read More
कुलवंत कौर के साथ बंसी लाल की रिपोर्ट। देश-विदेश में ख्याति प्राप्त लव कुश रामलीला कमे ..Read More
कुलवंत कौर के साथ बंसी लाल की रिपोर्ट। नई दिल्ली लाल किला ग्राउंड में आयोजित लव कुश रा ..Read More
कुलवंत कौर के साथ बंसी लाल की रिपोर्ट। असोला स्थित श्री सिद्ध शक्ति पीठ शनिधाम में शनि ..Read More
उत्तर प्रदेश के वृंदावन में भगवान श्री कृष्ण का गगनचुंबी मंदिर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भ ..Read More
कुलवंत कौर के साथ बंसी लाल की रिपोर्ट। विश्व हिन्दू परिषद ( विहिप) की दिल्ली में प्रां ..Read More