आखिरकार मानसून सत्र में भी एफसीआरए बिल लटक गया। बिल को 31 सदस्यी संयुक्त संसदीय समिति जेपीसी के पास भेज दिया गया है। समिति का गठन होना अभी बांकी है। समिति में लोकसभा के 21 सदस्य और राज्यसभा से 11 सदस्य शामिल होंगे। समिति शीतकालीन सत्र के अंतिम दिन तक रिपोर्ट पेश करेगी। इसके बाद ही बिल पर कोई चर्चा होगी। लेकिन इन सब के बीच सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर इस बिल पर इतनी हायतौबा क्यों मची है?
हायतौबा इस कदर मचा कि विपक्ष के अलावा विदेशी नेता भी इसमें कूद पड़े। अमेरिका के रिपब्लिकन सांसद रिले मूरे ने कहा कि एफसीआरए कानून में नए संशोधनों से भारतीय सरकार को चर्चों और धार्मिक संस्थाओं के नियंत्रण का अधिकार मिल जाएगा। इससे दोनों देशों के संबंधों पर असर पड़ सकता है। उन्होंने इसे ईसाइयों पर स्पष्ट हमला बताया। हालांकि इसका जवाब देते हुए भारत सरकार का विदेश मंत्रालय ने उनकी टिप्पणियों को खारिज करते हुए कहा कि यह भारत का आंतरिक मामला है। कई देश विदेशी फंड को नियंत्रित करते हैं।
एफसीआरए जिसे फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन अमेंडमेंट बिल 2026 अर्थात विदेशी अंशदान विनियमन संशोधन विधेयक कहा जाता है, क्या है? एफसीआरए कानून विदेश से मिलने वाले पैसे वास्तु या विदेशी प्रतिभूतियों को स्वीकार करने और इस्तेमाल करने के नियम तय करता है। इस कानून की मूल विशेषता है गैर सरकारी संस्था अर्थात एनजीओ को विदेशी चंदा लेने और उसका हिसाब देने के लिए एफसीआरए के तहत पंजीकरण अथवा अनुमति लेना। इसके तहत प्रावधान होगा कि विदेशी धन आए तो उसका स्त्रोत, उसका उपयोग और हिसाब की व्यवस्था पारदर्शी हो। धन का उपयोग राष्ट्र और राष्ट्रीयता के खिलाफ इस्तेमाल ना हो।
एफसीआरए का इतिहास
एफसीआरए कानून कोई नया नहीं है। सबसे पहली बार 1976 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के कार्यकाल में यह कानून लाया गया। इसके बाद पुनः कांग्रेस के ही शासनकाल में अर्थात यूपीए – 2, मनमोहन सिंह की सरकार ने 2010 में नया व्यापक एफसीआई कानून लाया जिसे संसद से पास होने के बाद 2011 में लागू किया गया। इसके बाद प्रधानमंत्री मोदी के पहले कार्यकाल में 2015 में इस कानून में महत्वपूर्ण बदलाव किए गए 2015 से 2022 तक निरंतर कुछ ना कुछ बदलाव होते रहे। जब 2020 में संशोधन किया गया तो उसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई। लेकिन इससे भी विपक्ष और खासकर एनजीओ को कोई लाभ नहीं हुआ। सुप्रीम कोर्ट 2020 के प्रमुख प्रतिबंधों को बरकरार रखते हुए फैसला सुनाया। इसके बाद प्रधानमंत्री मोदी सरकार ने 2023 से 25 के बीच कानून में लगातार निगरानी को लेकर और भी सख्त नियम बनाए, जो संशोधन बिल संयुक्त संसदीय समिति के पास गया है।
आपातकाल में लागू हुआ था एफसीआरए
देश में उन दिनों आपातकाल लगा हुआ था। सरकार यह सुनिश्चित करना चाहती थी कि विदेशी स्रोत से आने वाला धन भारत की राजनीतिक व्यवस्था, सांसद, राजनीतिक संगठनों और राष्ट्रीय जीवन के महत्वपूर्ण क्षेत्रों को अनुचित तरीके से प्रभावित न कर सके। इसी उद्देश्य से तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी सरकार ने यह कानून लाने का बीड़ा उठाया। जिसका अभी उनके पोते और मुख्य विपक्षी दल के नेता राहुल गांधी विरोध कर रहे हैं।
उस समय के कानून में सिर्फ विदेशी धन नहीं बल्कि विदेश से मिलने वाले अतिथि सुविधाओं को भी कानून के दायरे में रखा गया था। जिन चीजों को हाल में सदन में चर्चा के दौरान भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने राहुल गांधी के विदेश यात्रा पर उंगली उठाई। उस कानून में केवल राजनीतिक दल तक सीमित नहीं था। अकादमिक संस्थानों, संस्थाओं, शैक्षिक संगठनों और राष्ट्रीय महत्व के क्षेत्र में काम करने वाले व्यक्तियों को भी इसमें शामिल किया गया था।
इतना ही नहीं विदेशी योगदान स्वीकार करने और इसके इस्तेमाल पर सरकारी नियंत्रण तथा जानकारी उपलब्ध कराने की व्यवस्था कानून में बनाई गई थी। इंदिरा सरकार के कानून के मुताबिक इसके तहत सिर्फ विदेशी चंदा बंद करने के लिए नहीं बल्कि किसे विदेशी योगदान मिल सकता है, किसे नहीं, किस उद्देश्य से इस्तेमाल हो सकता है और सरकार को इसकी निगरानी कैसे करनी है। इन चीजों को ध्यान में रख कर इसका मूल ढांचा तैयार किया गया था। इसके बाद 1984 में एफसीआरए कानून में महत्वपूर्ण संशोधन किया गया। इसके तहत किसी एनजीओ के लिए गृह मंत्रालय में निबंधन, न्यायाधीशों को कानून के दायरे में लाना, विदेशी योगदान और फंड का लेखा-जोखा जैसी व्यवस्थाएं जोड़ी गई।
विपक्ष के विरोध का कारण
कांग्रेस नेता राहुल गांधी सहित पूरा विपक्ष एफसीआरए का विरोध कर रहा है। राहुल गांधी का कहना है कि यह कानून दमनकारी है। इसके जरिए अल्पसंख्यक समुदायों, गैर सरकारी संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की आवाज को दबाने की कोशिश की जा रही है। विपक्ष का तर्क है कि सरकार इस कानून के माध्यम से विदेशी फंड से चलने वाले सामाजिक और स्वयंसेवी संगठनों की संपत्तियों पर मनमानी ढंग से नियंत्रण या कब्जा करने की कोशिश कर रही है। कांग्रेस समेत अन्य विपक्षी दलों का आरोप है की संशोधन के जरिए चुनिंदा और विशेष विचारधारा वाले संगठनों को छूट दी जाती है जबकि स्वतंत्र सामाजिक संगठनों को निशाना बनाया जाता है। हालांकि यह काम सभी सरकारें करती आई है। अन्यथा आपातकाल के दौरान इस कानून को लागू नहीं किया जाता।
एफसीआरए बिल पर विपक्ष इस बात के लिए एतराज कर रहा है कि उसे लगता है इस बिल के लागू होने से विशेष समुदाय के साथ सरकार पक्षपात करेगी। उनका मानना है कि ईसाई समुदायों से जुड़े स्कूलों, अस्पतालों, अल्पसंख्यक संस्थाओं के कामकाज को इससे प्रभावित करने के लिए लाया गया है। साथ ही लाइसेंस रद्द होने पर परिसंपत्तियों का नियंत्रण वाले प्रावधान पर विपक्ष को ऐतराज है। विपक्ष के मुताबिक लाइसेंस रद्द होने पर जो स्कूल या अस्पताल किसी संस्था के नियंत्रण से संचालित है, वह प्रभावित होगा।
हालांकि इन चीजों को स्पष्ट करते हुए सरकार की ओर से सदन में केंद्रीय मंत्री किरण रिजिजू ने स्पष्ट कहा कि यह संशोधन देशहित और कानूनी पारदर्शिता के लिए है। इससे किसी भी वैध संस्था या अल्पसंख्यक पक्ष को कोई परेशानी नहीं होगी। बहरहाल अब देश और विदेश की निगाहें इस बात पर टिकी रहेगी कि संयुक्त संसदीय समिति में कौन सदस्य होंगे। कानून के संशोधन में उनका क्या रवैया रहता है। फिलहाल इन चीजों के लिए शीतकालीन सत्र तक का इंतजार करना पड़ेगा।
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