आज सम्पूर्ण विश्व पर्यावरण प्रदूषण जैसी गंभीर और चुनौतीपूर्ण समस्या से जूझ रहा है। हमारे चारों ओर ऐसे अनेक तत्व और गतिविधियाँ दिखाई देती हैं, जो प्रदूषण फैलाने के साथ-साथ प्रकृति के सुंदर संतुलन को भी निरंतर बिगाड़ रहे हैं। दुर्भाग्यवश, इन समस्याओं की रोकथाम हेतु किए जा रहे प्रयास अत्यंत सीमित प्रतीत होते हैं। जिस प्रकार किसी भी गंभीर रोग का उपचार उसके मूल कारणों को समझे बिना संभव नहीं होता, उसी प्रकार पर्यावरण प्रदूषण रूपी इस विकराल समस्या का समाधान भी तभी संभव है, जब हम इसके मूल कारणों का गहन अध्ययन और विश्लेषण करें। ‘मानव सभ्यता’ और ‘विकास’ आदिकाल से एक दूसरे के अभिन्न पूरक रहे हैं।
सनातन धर्म में विकास और भौतिकवादी विकास दो अलग-अलग अवधारणाएं हैं। भारतीय सनातन परम्परा, भौतिक विकास को कभी नहीं नकारती किन्तु उसे जीवन का अंतिम लक्ष्य मानने के स्थान पर आध्यात्मिक उत्थान का माध्यम मानती है। प्रस्तुत लेख में विकास की इन्ही अवधारणाओं का संक्षेप में विवेचन करते हुए यह प्रयास किया गया है कि पर्यावरण प्रदूषण की मूल जननी कहीं न कहीं अनियंत्रित भौतिकवादी विकास ही है। साथ ही, यह लेख भारत की प्राचीन संस्कृति, परम्पराओं, संस्कारों, पारिवारिक मूल्यों एवं रीति-रिवाजों की महत्ता को रेखांकित करते हुए सतत एवं संतुलित विकास की दिशा में उनके योगदान को प्रस्तुत करता है। आशा है कि यह लेख पर्यावरण प्रदूषण के प्रति जनसामान्य में जागरूकता उत्पन्न करने के साथ-साथ इसके निवारण हेतु व्यक्तिगत एवं सामाजिक स्तर पर अपनाए जा सकने वाले उपायों पर सार्थक चिंतन को भी प्रेरित करेगा।
सनातनवादी विकास: पर्यावरण का शाब्दिक अर्थ है कि चारों ओर से वरण अथवा आवरण अथवा भरण करना। वैदिक विचारधारा के अनुसार, पंचमहाभूत (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) ही जीवन का आधार है जो सह-अस्तित्व का भाव लिए समस्त जीवों की आवश्यकताओं की पूर्ती करते हुए, सम्पूर्ण जैव मंडल को एक सुदृढ़ सुरक्षा कवच भी प्रदान करते हैं। वेदों में पर्यावरण को निर्जीव या भोग्य वस्तु नहीं अपितु ईश्वर का साक्षात् रूप एवं प्राणदाता माना गया है। जैसा कि अथर्ववेद (१२.१.१२) में वर्णित श्लोक "माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः" में पृथ्वी को माता और स्वयं को इसके पुत्र का दर्ज़ा दिया गया है, साथ ही आकाश को पिता की संज्ञा दी गयी है। यह श्लोक पृथ्वी के साथ भावनात्मक और आध्यात्मिक सम्बन्ध स्थापित करता है इस प्रकार वेदों में पर्यावरण संरक्षण और संतुलन के लिए प्रकृति के प्रति असीम सम्मान एवं शृद्धा व्यक्त की गयी है। किन्तु हम प्रकृति से प्राप्त संरक्षण और सुरक्षा को तथाकथित विकास की आड़ में निरंतर नष्ट करने में लगे हुए हैं। सनातनवादी विकास, प्रकृति का शोषण नहीं, बल्कि उसके साथ सामंजस्य बिठाने पर जोर देता है। सनातन संस्कृति यह सिखाती है कि भौतिक विकास बुरा नहीं है, लेकिन उस विकास में 'संयम' और 'नैतिकता' (धर्म) का होना अनिवार्य है। बिना धर्म के भौतिकवादी विकास विनाश का कारण बनता है।
भौतिकवादी विकास: हम सभी के लिए यह गौरव का विषय है कि विगत कुछ सदियों में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में मानव ने अभूतपूर्व प्रगति करते हुए विकास के अनेक नए आयाम स्थापित किए हैं और उद्देश्य मात्र यह रहा कि कैसे मानव जीवन को सुविधाजनक एवं विलासिता पूर्ण बनाया जावे। किंतु विडम्बना यह रही कि इस लक्ष्य को अर्जित करने की चाह में हम आँखे मूँदे, विकास की इस अंधी दौड़ में शामिल हो बैठे। हमने दिन प्रतिदिन शोधित, नवीनतम तकनीक को तथाकथित विकास का एक सरल माध्यम बना डाला। लेकिन यह सब करते समय, उससे होने वाले प्रदूषण, ग्लोबल वॉर्मिंग, पारिस्थितिक असंतुलन जैसे सम्भावित गम्भीर दुष्परिणामों को नज़रंदाज़ किया। हमने प्रकृति द्वारा प्रदत्त बहुमूल्य संसाधनों का बेतहाशा दोहन किया किंतु इस प्रक्रिया में अपनी जीवनदायिनी धरती माँ की पीड़ा को अनुभव करने का प्रयास नहीं किया। परिणामस्वरूप आज सम्पूर्ण विश्व प्राकृतिक एवं मानवजनित आपदाओं की गंभीर चुनौतियों से जूझ रहा है, और मानव सभ्यता स्वयं को इनके समक्ष असहाय अनुभव कर रही है। संभवतः यही कारण है कि ‘भौतिकवादी त्वरित विकास’ की इस निरंतर दौड़ में “विकास” शब्द के साथ अनजाने में "विनाश" शब्द भी जुड़ता चला गया
परिवर्तन की इस प्रक्रिया में यदि कोई कमी रही तो वह यह है कि हम सनातनवादी से भौतिकवादी होते चले गए। हमने भौतिकवादी होने की चाह में अपनी पुरातन सांस्कृतिक एवं वैदिक विरासत, उत्तम जीवन शैली, परिवार एवं संस्कारों, मूल्यों आदि को कहीं दरकिनार कर दिया। परिणाम स्वरुप समाज के हर वर्ग ने, उनके द्वारा किए जा रहे कार्यों में मानवता, ईमानदारी, गुणवत्ता जैसे महत्वपूर्ण पहलुओं से समझौता करना आरम्भ कर दिया। जिसकी परिणिति के, आज आप और हम सभी साक्षी हैं।
सारांशतः इसी पीड़ा को व्यक्त करती निम्न पंक्तियाँ हैं :
विकास की अंधी दौड़ों में, हम संस्कारों को छोड़ रहे।उड़ने की इक चाहत में, रिश्ते-नाते सब तोड़ रहे।यों रोक नदी धारा को और काट धरा के वृक्षों को, कुल कायनात को नाप रहे, मंगल पर जीवन खोज रहे।पर जीवनदाई माँ वसुधा का, दामन ही हम निचोड़ रहे।है वक़्त अभी भी लौट चलो, लौटा दो सब इस धरती को,जिसे छीन, सभी हम दौड़ रहे।।
सुबह का भूला यदि शाम को घर लौट आए तो उसे भूला नहीं कहते। अतः अभी भी वक्त है कि हम समय रहते अपनी त्रुटियों को पहचानें और समाज के प्रत्येक क्षेत्र में उनका समुचित समाधान खोजने का सम्मिलित प्रयास करें यथा, शिक्षा, कार्य-क्षेत्र, घर, परिवार, समाज आदि, तो निस्संदेह हम समग्र और चिरस्थायी विकास की ओर बढ़ पाएँगे एवं इस धरती और इसके पर्यावरण को विनाश से बचा पाएंगे।
लेखक : डॉ. भारत प्रकाश सुनेजा सेवानिवृत्त प्रोफेसर एवं डीनराजस्थान तकनीकी विश्वविद्यालय, कोटा
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