''तुम्हारी अच्छी लोकप्रियता हो गई है। सीधे शब्दों में कहें तो तुम्हारी जनप्रियता बढ़ती जा रही है। चाहता तो था इस बार तुम चुनाव लड़ते। परंतु अभी तुम 24 वर्ष के ही हो। …और भारतीय चुनाव प्रक्रिया के अनुकूल 25 वर्ष का युवा चुनाव लड़ सकता है। इस नाते तुम अभी चुनाव नहीं लड़ सकते। अब मैं राजनीति से सन्यास लेना चाहता हूं। स्वास्थ्य भी साथ नहीं दे रहा है।“ ये शब्द योगी आदित्यनाथ के गुरु महंत अवैद्यनाथ के हैं। …जो उन्होंने सन 1996 में आम चुनाव के लिए नामांकन से पहले योगी आदित्यनाथ को कहा। योगी आदित्यनाथ गुरु की बातों को सुन कहा “महाराज जी, आप जब तक चुनाव लड़ सकते हैं लड़िये। मेरा जब समय आएगा तब देखेंगे।” महंत जी बोले, लेकिन मैं चाहता हूं इस बार मेरे चुनाव का प्रबंधन तुम करो।
योगी आदित्यनाथ निःसंकोच बोले “जैसी आपकी आज्ञा।” नामांकन के बाद चुनाव की तैयारी शुरू हो गई। योगी आदित्यनाथ पूरे मनोयोग से तैयारी शुरू कर दिए। उन्होंने पहली चुनावी रैली के लिए महाराणा प्रताप इंटर कॉलेज का मैदान चुना। रैली आयोजित की गई। रैली में जनसैलाब उमड़ा। योगी जी का भाषण सुनते हुए लोगों को आदित्यनाथ में अपना अगला जनप्रतिनिधि दिखने लगा। इस प्रकार चुनाव प्रचार का शुभारंभ हो गया। इस रैली के सफल आयोजन से महंत अवैद्यनाथ को दोहरी खुशी का अनुभव हुआ। …एक तो उन्हें लगने लगा कि आदित्यनाथ सही प्रबंधन कर रहा है। दूसरी उन्हें आदित्यनाथ में अपना उत्तराधिकारी दिखने लगा। इस चुनाव में महंत अवैद्यनाथ भारी मतों से विजयी हुए। यह चुनाव महंत जी के जीवन का अंतिम चुनाव है। इस चुनाव के बाद महंत जी सक्रिय राजनीति से संन्यास ले लिए।
केंद्र की सरकार डेढ़ साल बाद गिर गई। फिर चुनाव हुआ। इस बार महंत अवैद्यनाथ आदित्यनाथ को चुनाव लड़ाना चाहते थे। …सो भाजपा हाईकमान के पास अपनी इच्छा जाहिर की। पार्टी ने इनकी बात मान ली। …योगी आदित्यनाथ को गोरखपुर से पार्टी का टिकट मिल गया। …इस प्रकार योगी पहला चुनाव लड़े और छब्बीस हजार से भी अधिक मतों से जीते। इस बार योगी आदित्यनाथ सबसे कम उम्र के सांसद के रूप में संसद पहुंचे। इसके बाद वह पीछे मुड़ कर नहीं देखे।
इस प्रकार योगी आदित्यनाथ की छवि एक जनप्रिय नेता की बनने लगी। जब कोई नेता सभी वर्ग में स्वीकार्य होने लगता है। समाज के हर वर्ग के मसले को आसानी से सुलझा लेना ही जनप्रियता की पराकाष्ठा है। यहां एक प्रसंग की चर्चा करेंगे। जिसके बाद आप खुद ही योगी जी को जनप्रिय नेता कहने लगेंगे। दरअसल, यह उस समय की बात है जब योगी जी नया-नया सांसद बने थे। लेकिन उस समय तक अपने क्षेत्र में लोकप्रिय हो गए थे।
गोरखपुर मठ से कुछ दूरी पर हुमायूंपुर कॉलोनी है। मुस्लिम बहुल क्षेत्र है। कॉलोनी में एक पशु वधशाला हुआ करता था। यहां से चील – कौए हाड़ – मांस हिंदुओं के आंगन में, छत पर गिरा देता था। हिंदुओं का यह घर पशु वधशाला से थोड़ी ही दूरी पर थी। कई बार तो हाड़-मांस आंगन में तुलसी का पौधा अथवा बजरंगबली के ध्वजा के पास गिरा देता था। क्षेत्र के लोग काफी परेशान थे। बदबू चारों तरफ ऐसा रहता था कि आने-जाने वाले भी परेशान रहते थे। यहां तक की छावनी के जवान भी काफी परेशान थे। लेकिन सिविल का मामला होने के कारण वे ज्यादा ध्यान नहीं देते थे।
इसी मामले को लेकर जनप्रिय विहार कॉलोनी और हुमायूंपुर के पार्षद के साथ स्थानीय लोगों ने योगी जी के पास जाने का निर्णय लिया। अगले ही दिन कॉलोनी के पंद्रह–बीस आदमी मठ के दरवाजे पर दस्तक देते हैं। इन सब के साथ स्थानीय पार्षद भी थे। मठ का एक योगी प्रयोजन पूछता है। सभी लोग एक सुर में योगी आदित्यनाथ से मिलने की फरियाद करते हुए प्रयोजन बताते हैं। उन लोगों को उचित स्थान पर बैठा कर, योगी जी तक बात पहुंचाई गई।
योगी जी उस समय महंत अवैद्यनाथ के साथ बैठे थे। उन्होंने भी माजरा समझने के बाद कहा मामला पुराना है। मैंने भी कोशिश किया था। अब तुम्ही सुलझाओ आदित्यनाथ। गुरु जी का आदेश पाकर योगी आदित्यनाथ उनके बीच जाते हैं। उनकी बातों को ध्यान पूर्वक सुनते हैं। योगी जी यह आश्वासन देकर विदा करते हैं कि मैं उन लोगों से बात करता हूँ। लेकिन एक चीज याद रहे कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है। वैसे आप लोगों को बस हमारे साथ बने रहना है। बाकी हम देख लेंगे। यह सुनकर सभी प्रसन्नता के साथ एक सुर में बोले- हम सदैव आपके साथ हैं महाराज जी।
अगले दिन कॉलोनी के लोगों के साथ और अपने कुछ सहयोगियों को लेकर योगी जी धरने पर बैठ गए। धीरे-धीरे धरना से और भी लोग जुड़ गए। कॉलेज के छात्र सब जुड़ने लगे। बावजूद इसके धरना शांतिपूर्ण ढंग से चलता रहा। योगी जी ने निर्णय लिया कि 7 दिन में यदि प्रशासन हमारी बात नहीं मानती तो हम कलेक्ट्रेट का घेराव करेंगे। धरने के छठे दिन जिलाधिकारी के कार्यालय से कार्यालय पहुंचने का एक संदेश आता है। संदेश आता है की लखनऊ सचिवालय से सरकार के लोग आप से चर्चा करेंगे। योगी आदित्यनाथ जिला अधिकारी के पास पहुंचते हैं। वहां सचिवालय और जिलाधिकारी के बीच इनसे काफी लंबी चर्चा चलती है। चर्चा के बाद योगी जी बाहर बैठ गए। चर्चा होते-होते लगभग आधी रात हो गई।
आधी रात को जिलाधिकारी बाहर निकल कर मुस्कुराते हुए बोले, महाराज जी सरकार ने आपकी बात मान ली है, और लखनऊ से आया हुआ फैक्स दिखाते है। योगी जी प्रसन्नता से धन्यवाद करते हुए धरना स्थल के लिए निकलते हैं। धरना स्थल पर पहुंचते ही जो कार्यकर्ता आधी रात को नींद से ऊंघ रहे थे, समाचार सुनकर सभी प्रसन्नता से झूम उठते हैं। सभी कार्यकर्ता जोश के साथ झूमने लगे। जिंदाबाद के नारे लगाने लगे। इस प्रकार सरकार के आदेश के बाद अगले दिन वह पशु वधशाला बंद करा दिया गया। इस घटना के बाद योगी जी की प्रतिष्ठा और सम्मान और भी बढ़ गया।
एक दूसरी घटना, पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से पहले मायावती मुख्यमंत्री थी। उनके शासनकाल में मुस्लिम तुष्टिकरण जोरो पर था। क्योंकि इस चुनाव में मुसलमानों ने एकमुश्त वोट बहुजन समाज पार्टी को दिया था। इसलिए मायावती मुसलमानों को नाराज करना नहीं चाहती थी। गुजरात के अहमदाबाद में मायावती के मुख्यमंत्री बनने के 3 महीने बाद श्रृंखलाबद्ध बम धमाका हुआ जिसका तार यूपी से जुड़ा हुआ था। इसलिए एसआईटी की टीम गिरफ्तारी के सिलसिले में उत्तर प्रदेश आई थी। गिरफ्तारी के लिए आजमगढ़ के सरायमीर थाने में जब गुजरात पुलिस का दल पहुंचा तो थानेदार ऊपरी निर्देश के मुताबिक उनका स्वागत किया।
यूपी पुलिस को आभास हुआ की गिरफ्तारी मुस्लिम की होनी है, तो सरकार के तुष्टीकरण नीति के तहत थानेदार गुजरात पुलिस को घुमाना चाह रही थी। लेकिन मामला हाईप्रोफाइल होने के कारण थानेदार ने कहा कहां जाना है? क्या करना है? इस पर गुजरात पुलिस के लोगों ने कहा कि आप हमारे साथ अपने एक सब इंस्पेक्टर और पांच युवा सिपाही भेज दीजिए। यह सभी सादे लिबास में मौलवियों वाली टोपी पहने रहेंगे। थानेदार ने कहा ठीक है। जाना कहां है?.... ‘बीनापार’ गांव…. कल सुबह तड़के निकलना है। …तड़के सुबह वे लोग गांव में पूछते-पूछते मौलवी के पास पहुंचे।
मौलवी का नाम मुफ्ती अब्दुल बशर था। मौलवी अहमदाबाद बम कांड का मास्टर माइंड था। जिसे बाद में निचली अदालत ने फांसी की सजा दी थी। …खैर ये लोग बड़ी चालाकी से बसर को गिरफ्तार कर, वहां से निकल लिए। वहां के लोगों को पता भी नहीं चला कि मौलवी की गिरफ्तारी हुई है। क्योंकि गुजरात पुलिस मौलवी को कुछ और ही बता कर वहां से चल दिए। जब वहां लोगों को पता चला कि मौलवी की गिरफ्तारी हुई है। … तो लोग नारेबाजी करने लगे। जगह-जगह प्रदर्शन करने लगे। कहने लगे मौलवी निर्दोष है। इस घटना से योगी को काफी रोष था।
उन्होंने कहा, राष्ट्र सुरक्षा से कोई समझौता नहीं। बोले सरकार को तुरंत इन्हें प्रदर्शन करने से रोकना चाहिए। इस मुद्दे पर उन्होंने एक बैठक किया और बैठक में निर्णय लिया कि हम आजमगढ़ में एक आतंकवाद विरोधी रैली का आयोजन करेंगे। रैली का आयोजन 7 सितंबर सन 2008 को तय किया गया। सात सितंबर की सुबह जब योगी आदित्यनाथ का काफिला आजमगढ़ की ओर चला तो बीच में ही गुप्तचरों से सूचना मिली कि रास्ते में काफिला पर आक्रमण की तैयारी है। योगी आदित्यनाथ काफिला के साथ गेस्ट हाउस में रुकते हैं। आगे की रणनीति तय करते हैं।
काफिला लेकर चलते हैं। ऐन वक्त पर काफिला की स्थिति में थोड़ा परिवर्तन कर चल पड़ते हैं। सूचना सही निकली। जैसे ही काफिला आजमगढ़ के तकिया क्षेत्र से निकला, तो एक स्थान पर जहां सड़क के दोनों ओर आम के बगीचे थे। पेड़ की आड़ में सैकड़ों की संख्या में छुपे लोग काफिले पर टूट पड़े। उनका लक्ष्य था पिछली गाड़ियों को अपना शिकार बनाना। उन्हें शायद मालूम था कि योगी जी पिछली गाड़ियों में हैं। इसलिए उन्होंने पिछली गाड़ियों को ही निशाना बनाया। हमला लाठी, तलवार, पत्थर आदि से किया गया। लेकिन उन्हें क्या पता योगी जी तो निकल चुके हैं।
आदित्यनाथ सही सलामत रैली स्थल पर पहुंच गए। …और अपने ओजस्वी स्वरों से लोगों को प्रभावित किया। लोगों को संबोधित कर योगी आदित्यनाथ वहां से लौट गए। लेकिन आजमगढ़ में राष्ट्र सुरक्षा का जबरदस्त माहौल बना। इस रैली के बाद न सिर्फ आजमगढ़ बल्कि पूरे प्रदेश में योगी की लोकप्रियता बढ़ी। ऐसी और भी कई घटनाएं है जिसे जानने के बाद आप खुद ही योगीजी को जनप्रिय नेता का खिताब दे देंगे।
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